नई दिल्ली, अप्रैल 8। रिजर्व बैंक ने आज अपनी मौद्रिक नीति का ऐलान कर दिया है। पिछली कई बार की तरह इस बार भी आरबीआई ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। इस प्रकार इस बार रेपो रेट 4 फीसदी पर बना रहेगा। वहीं रिवर्स रेपो रेट 40 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 3.75 फीसदी कर दिया है। रेपो रेट 22 मई 2020 से लगातार 4 फीसदी पर बनी हुई हैं। इसके अलावा कैश रिजर्व रेश्यो भी 4 फीसदी पर बरकरार रखा है। रिजर्व बैंक यह द्विमासिक मौद्रिक नीति समिति की 3 दिवसीय बैठक 6 अप्रैल को शुरू हुई थी। मौद्रिक नीति की घोषणा का ऐलान आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने किया है।

पॉलिसी रुख अकोमोडेटिव रखा गया
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी रेट और बैंक रेट 4.25 फीसदी पर बना रहेगा। इसके अलावा पॉलिसी का रुख 'अकोमोडेटिव' रखा गया है। हालांकि उन्होंने बताया कि आगे चलकर अकोमोडेटिव रुख में बदलाव किया जाएगा। उन्होंने बताया कि दरों को लेकर अकोमोडेटिव रुख बरकरार है। सभी सदस्यों की सहमति से ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
आरबीआई के अनुमान
- चालू वित्तीय वर्ष में जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.8 फीसदी से घटाकर 7.2 फीसदी किया
- चालू वित्तीय वर्ष में के दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.2 फीसदी
- चालू वित्तीय वर्ष में के तीसरी में जीडीपी ग्रोथ अनुमान 4.3 फीसदी से घटाकर 4.1 फीसदी
- चालू वित्तीय वर्ष में के चौथी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ अनुमान 4.5 फीसदी से घटाकर 4 फीसदी
- आरबीआई ने जीडीपी ग्रोथ अनुमान कच्चे तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल को आधार मान कर लगाया है
जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाया, महंगाई का बढ़ाया
आरबीआई ने महंगाई के अनुमान को बढ़ा दिया है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि मौजूदा वित्त वर्ष में 5.7 फीसद महंगाई दर का अनुमान रखा गया है। इसके अलावा, आरबीआई ने जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान घटा दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध से आर्थिक रिकवरी पर असर के चलते चालू वित्त वर्ष 2022-23 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाकर 7.2 फीसद कर दिया गया है।
बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत
उन्होंने ने कहा कि अच्छे विदेशी मुद्रा भंडार के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था कंफर्ट की स्थिति में है। उन्होंने कहा कि आरबीआई अर्थव्यवस्था की किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है। दास ने कहा कि सप्लाई चेन में आए व्यवधानों से कमोडिटी और फाइनेंशियल मार्केट पर असर पड़ा है। क्रूड ऑयल की वैश्विक कीमतें काफी चढ़ चुकी हैं और अस्थिर बनी हुई हैं।
ब्याज दरें नहीं घटेंगी
आमतौर पर माना जाता है कि अगर रेपो रेट में कमी आती है, तो बैंक देर सबेर अपनी ब्याज दरें कम करते हैं। लेकिन इस बार भी रेपो और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव नहीं किया गया है, तो ऐसे में लोन की ब्याज दरें अपरवर्तित रह सकती हैं।
मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री
मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री काफी रोचक है। पूरे मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दर कभी उतना नहीं रही जितनी दर ठीक मोदी सरकार के शपथ के ठीक पहले थी। जब मोदी सरकार ने कार्यकाल संभाला तो रेपो रेट की दर 8 फीसदी थी, जो फिर कभी उतनी नहीं हुई है।
ये है रेपो रेट का सफर
-10 फरवरी 22 को 4 फीसदी
-8 दिसंबर 21 को 4 फीसदी
-8 अक्टूबर 21 को 4 फीसदी
-6 अगस्त 21 को 4 फीसदी
-4 जून 21 को 4 फीसदी
-7 अप्रैल 21 को 4 फीसदी
-5 फरवरी 21 को 4.00 फीसदी
-4 दिसंबर 20 को 4.00 फीसदी
-9 अक्टूबर 20 को 4.00 फीसदी
-6 अगस्त 20 को 4.00 फीसदी
-22 मई 2020 को 4.00 फीसदी
-27 मार्च 2020 को 4.40 फीसदी
-4 अक्टूबर 2019 को 5.15 फीसदी
-7 अगस्त 2019 को 5.40 फीसदी
-6 जून 19 को 5.75 फीसदी
-04 अप्रैल 19 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 19 को 6.25 फीसदी
-05 दिसंबर 18 को 6.50 फीसदी
-05 अक्टूबर 18 को 6.50 फीसदी
-01 अगस्त 18 को 6.50 फीसदी
-06 जून 18 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 18 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 18 को 6.00 फीसदी
-06 दिसंबर 17 को 6.00 फीसदी
-04 अक्टूबर 17 को 6.00 फीसदी
-02 अगस्त 17 को 6.00 फीसदी
-08 जून 17 को 6.25 फीसदी
-06 अप्रैल 17 को 6.25 फीसदी
-08 फरवरी 17 को 6.25 फीसदी
-07 दिसंबर 16 को 6.25 फीसदी
-04 अक्टूबर 16 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 16 को 6.50 फीसदी
-29 सितंबर 15 को 6.75 फीसदी
-02 जनवरी 15 को 7.25 फीसदी
-04 मार्च 15 को 7.50 फीसदी
-15 जनवरी 15 को 7.75 फीसदी
-28 जनवरी 14 को 8.00 फीसदी
मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब
क्या होती है रेपो रेट
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।
क्या होती है रिवर्स रेपो रेट
जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।
क्या होती है सीआरआर
देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।
क्या होती है एसएलआर
जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।
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