नई दिल्ली, जून 8। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जून एमपीसी (मौद्रिक नीति समिति) बैठक में पॉलिसी रेपो दर में 0.5 प्रतिशत या 50 आधार अंकों की वृद्धि की है। इससे पहले अप्रैल 2022 में हुई वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए एमपीसी की पहली बैठक में 4 प्रतिशत पर नीति रेपो दर को बरकरार रखा था। मगर बाद में आरबीआई ने आश्चर्यजनक रूप से रेपो दर में वृद्धि की थी। आरबीआई ने मई 2022 में हुई रेपो रेट में 0.4 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की थी, जिससे नीति दर को 4 प्रतिशत से बढ़ा कर 4.4 प्रतिशत कर दिया गया था। अब इसे 0.50 फीसदी बढ़ा कर 4.90 फीसदी कर दिया गया है। इससे बैंकों की लोन दरों में बढ़ोतरी होना तय है, जिसका बोझ लोगों पर पड़ेगा।
रेपो रेट बढ़ने का असर
रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों के लिए फंड की लागत (कॉस्ट ऑफ फंड) बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि रेपो दर वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई से पैसा उधार लेते हैं। नतीजतन आरबीआई द्वारा रेपो दर में बढ़ोतरी के बाद रिटेल और अन्य उधारकर्ताओं के लिए उधार लेने की लागत बढ़ जाती है।
कई बैंक महंगे कर चुके लोन
पिछले महीने मई में रेपो रेट में वृद्धि के बाद से कई बैंकों ने नए और मौजूदा दोनों उधारकर्ताओं के लिए अपनी उधार दरों में पहले ही बढ़ोतरी कर दी है। कई एनबीएफसी (नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी) और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने भी अपनी उधार दरों में वृद्धि की घोषणा की है।
इन पर पड़ता है तुरंत प्रभाव
आरबीआई रेपो दर वृद्धि का तत्काल प्रभाव रिटेल लोन, जैसे कि होम लोन, पर पड़ता है जो बैंक की एक्सटर्नल बेंचमार्क से लिंक्ड होती हैं। अधिकांश बैंकों ने अपनी उधार दरों को आरबीआई रेपो दर से लिंक किया है और इसलिए, उधारकर्ताओं के लिए प्रभाव तत्काल तौर पर पड़ेगा।
रेपो रेट लिंक्ड लेंडिंग रेट
रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों की रेपो रेट लिंक्ड लेंडिंग रेट (आरएलएलआर) भी बढ़ जाती है। इसका मतलब उधारकर्ता के लिए होम लोन की ब्याज दर में वृद्धि होती है। मगर आम तौर पर होता यह है कि बैंक ईएमआई बढ़ाने के बजाय, ज्यादातर मामलों में लोन की अवधि बढ़ा देते हैं।
इन पर तुरंत नहीं पड़ता असर
यदि आपके पास 7% वार्षिक ब्याज पर 20 साल की शेष अवधि के साथ 30 लाख रुपये का बकाया लोन है, तो आपकी ईएमआई 23,259 रुपये से 24,907 रुपये तक हो जाएगी। प्रत्येक लाख रुपये के लोन के लिए, आपकी ईएमआई में 55 रुपये बढ़ सकते हैं। इसके विपरीत, एमसीएलआर लोन लेने वालों पर तुरंत रेपो दर में वृद्धि का असर नहीं पड़ता। भले ही आरबीआई रेपो रेट में बढ़ोतरी से बैंकों के लिए फंड की लागत अधिक हो जाती है, फिर भी वे ईएमआई या कार्यकाल को फिर से निर्धारित तिथि आने पर ही संशोधित कर सकते हैं। एमसीएलआर से लिंक लोन में पुनर्निर्धारित तिथि आम तौर पर 12 महीने होती है, जबकि कुछ बैंकों के लिए यह 6 महीने के अंतराल पर भी होती है। कुल मिलाकर फ्लेक्सिबल होम लोन में ब्याज दर ऊपर-नीचे होती रहेगी। होम लोन की ईएमआई या ब्याज के बोझ को कम करने का एकमात्र तरीका यह है कि जब भी आपके पास अतिरिक्त धनराशि हो, तो बकाया लोन राशि का भुगतान करते रहें। जितनी जल्दी आप कर्ज चुकाएंगे, आपके घर के मालिक होने की लागत उतनी ही कम होगी।
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