भारत में हर सुबह 6 बजते ही करोड़ों लोग घर से निकलने से पहले एक नंबर जरूर चेक करते हैं—और वो है पेट्रोल-डीजल के दाम। आज यानी 8 मई, 2026 को तेल कंपनियों ने देशभर के लिए ईंधन की नई दरें जारी कर दी हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद, देश के ज्यादातर बड़े शहरों में कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं। कीमतों में स्थिरता का यह सिलसिला 2022 की शुरुआत से ही लगातार चला आ रहा है।
प्रमुख शहरों में आज क्या हैं पेट्रोल-डीजल के दाम
देश के महानगरों की बात करें तो दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 103.54 रुपये, बेंगलुरु में 102.96 रुपये और हैदराबाद में 107.50 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। वहीं चेन्नई में इसकी कीमत 100.84 रुपये, अहमदाबाद में 94.29 रुपये और कोलकाता में 105.41 रुपये प्रति लीटर है। तेल कंपनियों (OMCs) द्वारा सुबह 6 बजे अपडेट किए गए ये रेट आज पंप पर लागू रहेंगे।

डीजल की कीमतों पर नजर डालें तो दिल्ली में यह 87.67 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 90.03 रुपये, बेंगलुरु में 90.99 रुपये और हैदराबाद में 95.70 रुपये प्रति लीटर है। चेन्नई में डीजल 92.39 रुपये, अहमदाबाद में 89.95 रुपये और कोलकाता में 92.02 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है। ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कारोबारियों के लिए डीजल की ये कीमतें सीधे तौर पर उनके रोजाना के खर्च को प्रभावित करती हैं।
| शहर | पेट्रोल (रुपये/लीटर) | डीजल (रुपये/लीटर) |
|---|---|---|
| नई दिल्ली | 94.77 | 87.67 |
| मुंबई | 103.54 | 90.03 |
| बेंगलुरु | 102.96 | 90.99 |
| हैदराबाद | 107.50 | 95.70 |
| चेन्नई | 100.84 | 92.39 |
| अहमदाबाद | 94.29 | 89.95 |
| कोलकाता | 105.41 | 92.02 |
क्यों हर शहर में अलग-अलग होते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
अलग-अलग राज्यों में वैट (VAT), स्थानीय टैक्स और माल ढुलाई (ट्रांसपोर्टेशन) की लागत अलग होने की वजह से ईंधन की कीमतें भी बदल जाती हैं। बड़े शहरों में हैदराबाद और तिरुवनंतपुरम में पेट्रोल सबसे महंगा है, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे इलाकों में कीमतें काफी कम हैं। यही वजह है कि दिल्ली के मुकाबले हैदराबाद में पेट्रोल के लिए करीब 13 रुपये प्रति लीटर ज्यादा चुकाने पड़ते हैं।
मोटे तौर पर समझें तो पेट्रोल-डीजल की रिटेल कीमत में कच्चे तेल की लागत, रिफाइनिंग और माल ढुलाई का हिस्सा करीब 35 से 45 प्रतिशत होता है। इसमें केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) लगभग 20 से 25 प्रतिशत और राज्यों का वैट 20 से 30 प्रतिशत तक जुड़ता है। इसके अलावा डीलर कमीशन और तेल कंपनियों का मार्जिन मिलाकर 5 से 8 प्रतिशत होता है। यानी आप पंप पर जो कीमत चुकाते हैं, उसका करीब 40 से 55 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ टैक्स होता है।
कीमतों पर 'फ्रीज' और तेल कंपनियों पर बढ़ता दबाव
अप्रैल 2022 से ही सरकार ने एक नीति के तहत पेट्रोल, डीजल और एटीएफ (हवाई ईंधन) की कीमतों को स्थिर रखा है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कितने भी ऊपर-नीचे क्यों न हों। महंगाई पर लगाम लगाने और आम जनता की जेब बचाने के लिए यह कदम उठाया गया था। हालांकि, इसकी वजह से तेल कंपनियों (OMCs) को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अप्रैल 2026 तक पेट्रोल पर 18 रुपये और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का 'अंडर-रिकवरी' (घाटा) दर्ज किया गया है।
भारत सरकार ने 1 मई को पेट्रोल और डीजल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी में बदलाव किया था, लेकिन इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने साफ किया है कि ग्राहकों के लिए रिटेल कीमतों में कोई बदलाव नहीं होगा। वित्त मंत्रालय ने 1 मई, 2026 से पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 23 रुपये और डीजल पर 33 रुपये प्रति लीटर तय की है। इस बदलाव के बावजूद, IOC ने पुष्टि की है कि पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी के दाम नहीं बढ़ेंगे, जिससे जनता को वैश्विक कीमतों में आई तेजी से सुरक्षा मिलेगी।
क्या बढ़ने वाली हैं कीमतें? कच्चे तेल की तेजी बढ़ा सकती है टेंशन
सरकार लंबे समय से अटकी हुई ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी पर विचार कर रही है। आधिकारिक सूत्रों के संकेत मिल रहे हैं कि पेट्रोल और डीजल के दाम 4 से 5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। वहीं, घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 40 से 50 रुपये का इजाफा देखा जा सकता है। अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो करीब चार साल बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में यह पहली बढ़ोतरी होगी।
"सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि महंगाई पर इसका असर कम से कम हो," मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने बताया। हालांकि अभी अंतिम फैसला होना बाकी है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि अगले 5 से 7 दिनों के भीतर इस पर कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है। आम आदमी के लिए यह खबर उनके महीने के बजट को बिगाड़ सकती है।
ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की दर, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और घरेलू टैक्स नीतियों पर निर्भर करती हैं। वैश्विक अस्थिरता के बावजूद तेल कंपनियों ने अब तक कीमतों को काबू में रखा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसका भुगतान डॉलर में होता है। ऐसे में रुपये की कमजोरी आयात को महंगा बना देती है। मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए, आज की ये स्थिर कीमतें शायद ज्यादा दिनों तक न टिकें।
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