नई दिल्ली, मई 31। दिल्ली का डबास परिवार राजधानी के जाट खोर से ताल्लुक रखता है। इनके पास 28 एकड़ कृषि भूमि है। वर्षों से अपनी पैतृक भूमि के मालिक इस परिवार ने अपने परिवार और रिश्तेदारों की अनाज और भोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए कृषि उपज का उपयोग करने के लिए खुद को सीमित कर दिया। मगर 2009 की एक घटना ने परिवार की युवा पीढ़ी को एक अलग और नया रास्ता अपनाने पर मजबूर कर दिया। परिवार में मृणाल और लक्ष्य की दादी को कैंसर हो गया। उनका स्वास्थ्य परिवार के लिए एक झटका था। असल में परिवार तब तक 2002 से मुख्य रूप से सब्जियां उगाने के जैविक तरीकों पर निर्भर था। मगर इसके बाद दोनों भाइयों, मृणाल और लक्ष्य, ने खेती के तरीके में बदलाव किया और अब वे सालाना 3.5 करोड़ रु कमाते हैं।
ऑर्गेनिक फूड पर दिया ध्यान
इस परिवार ने स्वस्थ भोजन के महत्व के बारे में जाना और बेहतर और केमिकल मुक्त भोजन पर जोर देना चाहा। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार घातक बीमारी के बावजूद मृणाल की दादी को ऑर्गेनिक भोजन ने दर्दनाक कीमोथेरेपी से बचा लिया। मगर फरवरी 2018 में उनका निधन हो गया। मृणाल के अनुसार भोजन की क्वालिटी ने उन्हें इतने सालों तक जीवित रहने में मदद की।
इस तरह की शुरुआत
इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट होने के बावजूद मृणाल और उनके 27 वर्षीय भाई लक्ष्य, जो एन्वायरमेंट एंड डेवलपमेंट में ग्रेजुएट हैं, ने ऑर्गेनिक भोजन के हेल्थ बेनेफिट को लोगों तक पहुंचाने का फैसला किया। उन्होंने खेत में सब्जियां और अनाज का बड़े पैमाने पर उत्पादन पर काम करना शुरू किया। 2013 में सब्जियों, गेहूं, दाल, सरसों, चावल, बाजरा और फलों की फसलों का उत्पादन बढ़ाया।
कमा रहे सालाना 3.5 करोड़ रु
दोनों भाइयों ने ऑर्गेनिक एकड़ ब्रांड नाम से ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्ट बेचना शुरू किया। वर्तमान में वे दिल्ली में लगभग 5,000 परिवारों तक अपना प्रोडक्ट पहुंचाते हैं। वे फसल के 12 घंटे के भीतर ताजा उपज प्रदान करते हैं। वे शहरी निवासियों को खेती के करीब लाने और ऑर्गेनिक भोजन के महत्व को समझने के लिए कृषि-पर्यटन को भी बढ़ावा देते हैं। ये दोनों भाई लोगों और किसानों को ऑर्गेनिक खेती अपनाने में मदद करने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित करते हैं। कारोबार से उन्हें सालाना 3.5 करोड़ रुपये की कमाई होती है।
खोजा पूरे साल कमाई का आइडिया
मृणाल, जो कंपनी के प्रबंध निदेशक भी हैं, के अनुसार वर्षों में भाइयों ने एक मॉडल और फसल पैटर्न तैयार किया जो पूरे वर्ष एक स्थिर फसल और स्थिर इनकम मुहैया करे। अब इन्हें पूरे साल कमाई होती है। वे मौसमी सब्जियां लगाते हैं और फिर खेती के लिए एक व्यवस्थित तरीका अपनाते हैं। उन्हें बैचों में लगाया जाता है और 15 दिनों के अंतराल में उगाया जाता है। इसलिए, जब फसल शुरू होती है, तो उपज का निरंतर प्रवाह बरकरार रहता है।
450 लोगों को दी गयी ट्रेनिंग
अब तक किसानों सहित 450 लोगों को इन फार्म पर प्रशिक्षित किया जा चुका है। लक्ष्य के अनुसार भारत को जैविक खेती के जरिए कृषि में एक क्रांति की जरूरत है।
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