देश में कोरोना से चारों तरफ हाहाकार मचा है। कोरोनावायरस महामारी की वजह से देश में 3 मई तक लॉकडाउन लागू है। वहीं लॉकडाउन में दाल-चावल की कीमतों में इजाफा देखने को मिल रहा जबकि सब्जियां सस्ती हुईं।
नई दिल्ली: देश में कोरोना से चारों तरफ हाहाकार मचा है। कोरोनावायरस महामारी की वजह से देश में 3 मई तक लॉकडाउन लागू है। वहीं लॉकडाउन में दाल-चावल की कीमतों में इजाफा देखने को मिल रहा जबकि सब्जियां सस्ती हुईं। मार्च माह में देश में खाने-पीने की चीजों के दाम घट गए थे। लेकिन कोरोना वायरस की वजह से लगाए गए लॉकडाउन में इनकी कीमतें फिर से बढ़ रही हैं। चावल, दाल, गेहूं आदि जैसे आम खाद्य पदार्थों की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है। मालूम हो कि सबसे ज्यादा दाम दाल और वनस्पति तेल के बढ़े हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में अरहर दाल की कीमत लॉकडाउन से पहले 93 रुपये प्रति किलो थी। वहीं दो दिन पहले 28 अप्रैल को यह 106 रुपये प्रति किलो दर्ज की गई।

छोटे शहरों में कीमतें ज्यादा बढ़ी
चने की दाल की कीमत 72 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 86 रुपये प्रति किलो, मसूर दाल की 71 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 81 रुपये प्रति किलो, सरसों के तेल की कीमत 124 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 132 रुपये प्रति किलो और सोया तेल की कीमत 111 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 121 रुपये प्रति किलो पर जा पहुंची है। आईजीआईडीआर रिपोर्ट के मुताबिक, लॉकडाउन के 28 दिनों के दौरान कई दालों की कीमत लॉकडाउन से पहले के माह के मुकाबले औसतन लगभग 6 फीसदी बढ़ गई हैं। ज्यादातर खाने के तेल 3.5 फीसदी महंगे हो गए हैं। आलू का भाव 15 फीसदी और टमाटर का 28 फीसदी बढ़ा है। छोटे शहरों में कीमतें ज्यादा बढ़ी हैं। वहीं कुछ छोटे शहरों में खुदरा खाद्य कीमतों में 20 फीसदी तक की वृद्धि हुई है।
लॉकडाउन ने शहरी क्षेत्रों के फूड मार्केट्स को भी अव्यवस्थित कर दिया है। कई रिपोर्ट्स दर्शाती हैं कि आवश्यक चीजों की खरीद और ट्रांसपोर्टेशन को लॉकडाउन से छूट के दिशा-निर्देशों के बावजूद, लॉकडाउन को मेंटेन करने को खाद्य सुरक्षा को मेंटेन करने से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि खाद्य सुरक्षा से समझौता हुआ है। आईजीआईडीआर रिपोर्ट कहती है कि सर्वे संकेत देते हैं कि लॉकडाउन में 11159 वर्कर्स में से लगभग 96 फीसदी को सरकार से राशन नहीं मिला है। वहीं 72 फीसदी का कहना है कि उनका राशन दो दिन में ही खत्म हो गया और 90 फीसदी का कहना है कि उन्हें वेतन/मजदूरी नहीं मिली है।


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