Nifty Target: वैश्विक हालात और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय शेयर बाजार को लेकर चिंता बढ़ती नजर आ रही है। इसी बीच ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म BNP Paribas ने 2026 के लिए अपने आकलन में सतर्क रुख अपनाया है और Nifty 50 का टारगेट करीब 11% घटाकर 25,500 कर दिया है। इससे पहले Goldman Sachs और Nomura भी निफ्टी के टारगेट में कटौती कर चुके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कंपनियों की कमजोर कमाई (अर्निंग्स) का अनुमान और विदेशी निवेशकों की धीमी भागीदारी बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है। खासतौर पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण तेल की कीमतों में आई तेजी ने बाजार की उम्मीदों को पहले के मुकाबले कम कर दिया है।
GDP पर क्रूड की कीमत बढ़ने का असर-
ब्रोकरेज के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी रहती है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ेगा और बाजार में रिकवरी की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
कंपनियों के मार्जिन पर असर-
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मौजूदा अनुमान अभी तक बढ़ती लागत और कमजोर मांग के पूरे असर को नहीं दिखाते। पिछले तेल झटकों की तरह इस बार भी अलग-अलग सेक्टर में कंपनियों की कमाई के अनुमान घटाए जा सकते हैं। इनपुट कॉस्ट बढ़ने, महंगाई के दबाव और मांग में कमजोरी की वजह से कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है। साथ ही, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से बाजार के वैल्यूएशन में तेज उछाल की संभावना भी सीमित रह सकती है।
कंपनियों की कमाई की रफ्तार भी धीमी-
ब्रोकरेज के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रुख फिलहाल सतर्क बना हुआ है। ग्लोबल बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी तेजी के मुकाबले भारत कुछ पीछे नजर आ रहा है और कंपनियों की कमाई की रफ्तार भी धीमी है, जिससे निवेशकों का उत्साह कम हुआ है। इसके अलावा, AI का असर लंबे समय में सर्विस सेक्टर की नौकरियों और खपत पर भी पड़ सकता है, जो एक नई चुनौती बनकर उभर सकता है।
₹1.6Lk Cr के राजस्व का नुकसान संभव-
मैक्रो स्तर पर भी जोखिम बढ़ता दिख रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) करीब 35 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकता है। वहीं, अगर सरकार ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी घटाती है, तो उसे सालाना करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हो सकता है। इससे सरकार को पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) में कटौती करनी पड़ सकती है, जो आर्थिक विकास के लिए नकारात्मक संकेत होगा।
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