Mutual Funds; SIP: आज के समय में हर कोई अपने बेहतर भविष्य के लिए निवेश की प्लानिंग करता है। निवेश के दर्जनों ऑप्शन में से अपनी जानकारी और पसंद के हिसाब से लोग अलग-अलग स्कीम में पैसा लगाते हैं। हालांकि, तमाम निवेश ऑप्शन में से म्यूचुअल फंड्स की स्कीम में निवेशकों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। इसका कारण इनमें अन्य के मुकाबले बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना अधिक होती है। म्यूचुअल फंड्स की स्कीम में लॉन्ग टर्म निवेश पर मिलने वाला रिटर्न को देखें तो यहां औसतन 12-15 फीसदी तक रिटर्न मिलता है जबकि अन्य में 7-8 या फिर 10 फीसदी तक के रिटर्न मिलते हैं।

म्यूचुअल फंड में किया गया निवेश धीरे-धीरे आपके पैसे को कई गुना मल्टीप्लाई कर एक मोटा कॉर्पस बना देता है। ऐसे में कुछ बेसिक सवाल लोगों के मन में उठते हैं कि कम पैसे में ज्यादा दिन निवेश करने से या फिर अधिक पैसे में कम समय तक निवेश करने में फायदा मिलेगा। यानी यदि कोई व्यक्ति 10,000 रुपये हर महीने 20 साल तक SIP करता है तो या फिर 20,000 रुपये 10 साल तक निवेश करता है तो, किसमें ज्यादा फायदा होगा और कौन करोड़पति बना सकता है? यदि आपके भी मन में ऐसे सवाल हैं तो चलिए इसके कैलकुलेशन को समझ लेते हैं...
CASE 1 : 20 साल तक हर महीने 10,000 की SIP
मान लेते हैं कि एक व्यक्ति हर महीने 10,000 की SIP शुरु करता है और 20 साल की अवधि तक करता है। ऐसे में उनके द्वारा निवेशित राशि 24,00,000 रुपये होगा। अब यदि उनको यहां पर 12 फीसदी का सालाना रिटर्न मिलता है तो उनके पास 74,91,000 रुपये का फंड तैयार हो जाएगा। वहीं यदि 15 फीसदी की दर से रिटर्न मिलता है तो 1,51,59,550 रुपये का कॉर्पस तैयार हो जाएगा। यानी करोड़पति बन जाएगा। यहां पर ब्याज और कंपाउंडिंग से उसे 1.25 करोड़ रुपये मिलेंगे।
CASE 2: 10 साल तक हर महीने 20,000 रुपये की SIP
अब दूसरे केस में मान लेते हैं कि कोई व्यक्ति हर महीने 20,000 रुपये की SIP करता है और यह सिलसिला 10 साल तक चलता है। यानी इस अवधि में कुल निवेशित राशि भी 24,00,000 रुपये ही होगी।
अब यदि उनको 12 फीसदी के हिसाब से सालाना रिटर्न मिलता है तो उन्हें 46,50,000 रुपये का टोटल फंड मिलेगा। यानी केवल 22.5 लाख रुपये ब्याज और कंपाउंडिंग से मिलेंगे। वहीं, 15 फीसदी सालाना रिटर्न मिलने पर 55,73,145 रुपये का कॉर्पेस मिलेगा। यानी ब्याज और कंपाउंडिंग से केवल 31.73 लाख रुपये मिलेंगे।
निष्कर्ष
दोनों केस में कैलकुलैशन को देखने पर पता चलता है कि एसआईपी में निवेश की राशि से ज्यादा निवेश की अवधि मायने रखता है। यहां पर कम निवेश के साथ लंबी अवधि तक उसे बनाए रखने पर ज्यादा मुनाफा मिलने की संभावना अधिक होती है। यानी निवेश की अवधि जितना कम होगा उतना कम रिटर्न मिलेगा और जितना अधिक होगा मुनाफा या रिटर्न उतना अधिक बढ़ता जाएगा। समय बढ़ने के साथ निवेश पर मिलने वाला ब्याज पर कंपाउंडिंग का जादू बढ़ता जाता है। यही कारण है कि फाइनेंशियल एडवाइजर हमेशा कहते हैं, 'Market को टाइम मत करो, मार्केट में टाइम बिताओ।'
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