नई दिल्ली, अगस्त 10। अगर कोई आईटी सेक्टर की एक तगड़ी सैलेरी वाली नौकरी छोड़ कर खेती करने लगे तो आप उसके क्या बारे में सोचेंगे? जाहिर है यही सोचेंगे कि इस शख्स ने गोल्डन चांस गंवा दिया। मगर यदि वही शख्स खेती से करोड़पति बन जाए तब? तब आपकी सोच बदल जाएगी। बिलकुल ऐसा ही किया है देहरादून में रहने वाली हिरेशा वर्मा ने। हिरेशा के पास आईटी सेक्टर में तगड़ी सैलेरी वाली जॉब थी। मगर एक घटना ने उनकी सोच को बहुत प्रभावित किया। ये घटना थी 2013 में आई उत्तराखंड बाढ़। उस घटना ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया और उनके सामने दिक्कतें पैदा कर दीं। लोगों की समस्याओं के मद्देनजर हिरेशा ने नौकरी छोड़ उनकी मदद करने का फैसला किया। मदद की नियत ने उन्हें राह दिखाई और आज उनकी सालाना इनकम करोड़ों में है।
क्या आया मन में ख्याल
2013 की बाढ़ के बाद हिरेशा के मन में आया गांव वालों के साथ मिल कर कुछ काम करना। ताकि लोगों का गुजारा हो सके। उन्होंने मशरूम की खेती शुरू करने का फैसला किया। जिस साल राज्य में बाढ़ आई उसी साल उन्होंने ये काम शुरू किया। अब 8 साल बाद उनके साथ 2000 लोग काम करते हैं। उनका सालाना 1.5 करोड़ रु का कारोबार है।
कितने तरह के हैं मशहूर
हिरेशा के पास 1-2 नहीं बल्कि पूरे 9 तरह के मशरूम हैं, जिन्हें वे उगाती हैं। दरअसल उत्तराखंड एक ठंडा राज्य है। इसलिए राज्य में मशरूम की खेती बढ़िया और आसान तरीके से होती है। बात करें उनकी शुरुआत की तो हिरेशा ने किसी खेत से नहीं, बल्कि अपने घर से ही मशरूम उगाना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने हिमाचल के डायरेक्टोरेट ऑफ मशरूम रिसर्च से ट्रेनिंग भी ली। इस ट्रेनिंग की अवधि सिर्फ एक महीने थी।
सिर्फ 2 हजार रु से शुरुआत
हिरेशा ने अपने नये काम की शुरुआत सिर्फ 2 हजार रु से की थी। 2-3 महीने में तैयार हुए मशरूम को बेचने पर उन्हें 5 हजार रु मिले। यानी करीब दोगुना मुनाफा। जाहिर सी बात है ऐसे में हिरेशा का आत्मविश्वास बढ़ना ही था। अगले साल यानी 2014 में किराए पर जगह लेकर उसमें झोपड़ीनुमा इंफ्रास्ट्रक्चर में हिरेशा ने मशरूम उगाने शुरू किए। वे 500 से ज्यादा मशरूम के बैग्स लगाने में कामयाब रहीं। उनकी मेहनत रंग लाई और बहुत कम समय में उन्हे मशरूम मिलने लगे।
कैसे जुड़े गांव वाले
मशरूम तैयार होने पर जब हिरेशा ने उन्हें मंडी में बेचा तो गांव वालों को उनके काम के बारे में पता चला। गांव वालों को उनका काम पसंद आया और वे उनसे जुड़ने लगे। उनके पास 2000 से अधिक गांव वाले कार्यरत हैं। इनमें वे महिलाएं भी हैं, जिन्होंने बाढ़ से नुकसान झेला। उन्हें 2-3 साल का समय लगा अपना बिजनेस को ठीक तरह से जमाने में।
सामने आई एक अड़चन
हालांकि उनके सामने एक दिक्कत आई। दरअसल गर्मी के मौसम में मशरूम का प्रोडक्शन ढंग से नहीं हो पा रहा था। इसका तरीका था एसी रूम। मगर उसके लिए पैसे चाहिए थे। तो हिरेशा ने बैंक से लोन लिया। अब उनके पास 10 एसी रूम हैं। उनका एक दिन का प्रोडक्शन ही 1 टन है। एक और अहम बात कि अब ग्राहक उनके पास मशरूम खरीदने आते हैं। हिरेशा को मंडी भी नहीं जाना पड़ता।
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