नयी दिल्ली। ईपीएफओ (Employees' Provident Fund Organisation) ने फॉर्मल सेक्टर की कंपनियों को राहत देते हुए लॉकडाउन के दौरान प्रोविडेंट फंड (पीएफ) में पैसे जमा करने में देरी के लिए एम्प्लोयर्स पर जुर्माना न लगाने का फैसला किया। इसके अलावा कंपनियों को कम कर्मचारियों की तरफ से ईपीएफ में कम योगदान करने का भी बेनेफिट मिलेगा, जैसा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में ऐलान किया है। यह कोरोनावायरस से निपटने के लिए आर्थिक पैकेज का हिस्सा है। श्रम और रोजगार मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए बयान में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान कंपनियों के सामने समय पर ईपीएफ योगदान जमा करने का संकट है। अगर कंपनियां देर से पैसा जमा करती हैं तो इसे डिफॉल्ट नहीं माना जाएगा और उन पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।

कंपनियों पर है दबाव
आधिकारिक बयान में कहा गया है कि कंपनियों पर दबाव है और वे सामान्य तरीके से संचालन और जरूरी योगदान नहीं कर पा रही हैं। इसके पीछे लंबे समय सम चल रहा लॉकडाउन है। सरकार ने कहा है कि ईपीएफओ के ईपीएफ योगदान में ढील देने के फैसले से 6.5 लाख कंपनियों को राहत मिलेगी। साथ ही इससे वे अतिरिक्त शुल्क की देनदारी से भी बचेंगी। इस कदम से कैश संकट का सामना कर रही कंपनियों को देर से ईपीएफ योगदान जमा करने की फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी। ईपीएफओ के सीईओ ने कंपनियों से कहा कि वे श्रमिकों को ईपीएफ योगदान में कटौती का लाभ पहुंचाएं।
वित्त मंत्री ने किया था ऐलान
सैलेरी वाले कर्मचारियों के पास ज्यादा पैसे रहने देने और एम्प्लोयर्स (कंपनियों) पर बोझ कम करने के लिए 13 मई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जरूरी पीएफ योगदान नियमों में ढील देने की घोषणा की थी। सरकार ने ये फैसला 6,750 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी सहायता प्रदान करने के लिए लिया था। ये बेनेफिट कर्मचारियों के साथ ही कंपनियों को मिलेगा। सरकार के फैसले के तहत वैधानिक पीएफ योगदान को अगले 3 महीनों के लिए 12 फीसदी से घटा कर 10 फीसदी कर दिया जाएगा, जो कर्मचारी और कंपनी दोनों के लिए होगा। ये फैसला ईपीएफओ द्वारा कवर किए जाने वाले सभी तरह के सेक्टरों के लिए लागू होगा।


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