नयी दिल्ली। सरकार दो पीएसयू कंपनियों में हिस्सेदारी बेच कर 20000 करोड़ रु जुटाने की योजना बना रही है। इनमें दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कोल इंडिया शामिल है। दूसरा है एक सरकारी बैंक। सरकार का उद्देश्य इस तरह पैसा जुटा कर कोरोना संकट से निपटने के लिए राहत कार्यक्रम को सपोर्ट देना है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार प्रस्ताव में शेयर बाजार की स्थिति देखते हुए शेयरों की बिक्री की जाएगी। अगर वैल्यूएशन आकर्षक न हो तो कोल इंडिया सरकार से शेयरों की वापस खरीद (बायबैक) कर सकती है। बता दें कि कोरोनावायरस महामारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजट उद्देश्यों को पटरी से उतार दिया है।
कहां करना पड़ा सरकार को खर्च
कोरोना के तेजी से फैलने के कारण लॉकडाउन के बीच सरकार को कल्याणकारी योजानओं और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए खर्च को बढ़ावा देना पड़ा। पीएम मोदी ने फरवरी में विनिवेश के जरिए 2.1 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्लान बनाया था ताकि बजट घाटे को जीडीपी के 3.5 फीसदी पर रखा जा सके। आर्थिक नुकसान के बावजूद कोरोना का फैलना जारी है। अब भारत ने संक्रमितों की संख्या के मामले में रूस को पीछे छोड़ दिया है। भारत इस समय 740,000 से अधिक कोविड-19 मामलों के साथ दुनिया का तीसरा सबसे अधिक प्रभावित देश बन गया है, जिससे फाइनेंस पर और दबाव पड़ रहा है।
सरकार के इस प्लान पर फिरा पानी
अंतरराष्ट्रीय ट्रेवल पर लगी पाबंदी और कच्चे तेल की कीमतों ने सरकार के एयर इंडिया और देश की दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनर भारत पेट्रोलियम को बेचने के प्लान पर भी पानी फेर दिया। सरकार का मौजूदा वित्त वर्ष का विनिवेश लक्ष्य पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले दोगुने से अधिक है। एलआईसी ने पिछले साल आईडीबीआई बैंक का 51% हिस्सा खरीदा, जबकि सरकार के पास इसकी लगभग 47 फीसदी हिस्सेदारी रह गई। कोल इंडिया में सरकार की 66 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी है। इसने जनवरी 2015 में 225.5 अरब रुपये के लिए कंपनी की 10 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी।
सरकार के पास खत्म हो रहा पैसा
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार के पास बहुत जल्द बजट की फंडिंग के विकल्प समाप्त हो सकते हैं। सरकार को फाइनेंशियल मदद के लिए फिर से आरबीआई की शरण में जाना पड़ सकता है। प्रशासन राजस्व को बढ़ावा देने के लिए आरबीआई को सीधे सॉवरेन बांड खरीदने या लाभांश को बढ़ावा देने को कह सकती है। संभावित क्रेडिट रेटिंग डाउनग्रेड भारत के लिए एक और जोखिम है, जो इस साल चार दशकों से अधिक समय में अपनी पहली आर्थिक गिरावट की ओर बढ़ रहा है। एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का क्रेडिट स्कोर फिच रेटिंग्स और मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस के पास 'जंक' से केवल एक कदम दूर है।
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