माइनिंग सेक्टर को लेकर आज 14 अगस्त को एक बड़ी खबर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को माइनिंग कंपनियों और केंद्र से रॉयल्टी पर 1 अप्रैल, 2005 से पहले का बकाया वसूलने की अनुमति दे दी है. बकाया वसूलने को लेकर यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनाया.
फैसला आने के बाद माइनिंग सेक्टर के शेयरों में तेज करेक्शन देखने को मिल रहा है. बता दें कि संविधान पीठ ने 25 जुलाई के उसके फैसले पर सुनवाई की जिसमें खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि पर टैक्स लगाने के राज्यों के अधिकार को बरकरार रखा गया था, पूर्वव्यापी रूप से लागू किया जाएगा या भावी रूप से.
12 सालों में टैक्स डिमांड है चुकाना
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि ये बकाया भुगतान 12 सालों में किए जाने चाहिए. साथ ही राज्यों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे पिछली मांगों के लिए जुर्माना या एक्स्ट्रा टैक्स न लगाएं. कोर्ट ने कहा कि टैक्स की मांग के भुगतान का समय 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 12 सालों की अवधि में किश्तों में विभाजित किया जाएगा.
झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों ने इस फैसले को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने की वकालत की थी, जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान ने भावी कार्यान्वयन के लिए केंद्र की प्राथमिकता का समर्थन किया था. CJI ने कहा कि राज्यों को राजस्व की आवश्यकता है और उल्लेख किया कि भावी फैसले को खारिज करने का कोई सवाल ही नहीं है.

फैसले का माइनिंग कंपनियों पर असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों के शेयरों पर दिख रहा है. हिंदुस्तान जिंक, NMDC, कोल इंडिया और SAIL जैसे शेयर में 1-3 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की जा रही. इसके अलावा टाटा स्टील में भी 3.6% की गिरावट देखी गई.
कंपनियों के लिए कितना नुकसानदेय है ये फैसला
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से माइनिंग कंपनियों पर बहुत ज़्यादा वित्तीय असर पड़ेगा. इस सेक्टर में भविष्य में होने वाले निवेश पर भी असर पड़ सकता है. खनन मंत्रालय के एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि इस फैसले से माइनिंग के भविष्य पर असर पड़ सकता है, जब तक कि इसके खिलाफ़ कोई नया कानून नहीं लाया जाता. भारतीय खनिज उद्योग महासंघ के महासचिव आर.के. शर्मा ने कहा कि अगर सरकार इस निर्णय से निपटने के लिए कानून नहीं लाती है तो इससे खनन का भविष्य प्रभावित होगा.
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