2025 में विमानन क्षेत्र से जुड़ी कई घटनाएं चर्चा का विषय बनी हुई हैं। मेडे कॉल, तकनीकी खराबी, और साइबर खतरों के मामलों में बढ़ोतरी ने यात्रियों और विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि हवाई यात्रा आज भी बाकी परिवहन माध्यमों के मुकाबले सुरक्षित है, लेकिन हालिया घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उड़ानों की सुरक्षा में कुछ कमज़ोरियां आ गई हैं।

मेडे कॉल्स में बढ़ोतरी
'मेडे' और 'पैन पैन पैन' जैसी आपातकालीन कॉल्स जो किसी गंभीर तकनीकी या परिचालन दिक्कत के समय पायलट द्वारा भेजी जाती हैं, अब पहले से ज़्यादा सुनने को मिल रही हैं। इस तरह की घटनाएं कभी-कभी उड़ान के बीच में तकनीकी खराबी या इंजन फेल होने के कारण होती हैं। इससे यात्रियों की घबराहट बढ़ना स्वाभाविक है, भले ही पायलट आपातकालीन स्थिति को संभाल लें।
तकनीकी खराबियां चिंता का विषय
भारत में 2020 से 2025 के बीच 65 से ज्यादा इंजन फेल्योर की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें से कई मामलों में खराब ईंधन फिल्टर, ईंधन की क्वालिटी या मशीनरी में आई तकनीकी दिक्कतें कारण बनीं। एक हालिया उदाहरण एयर इंडिया की फ्लाइट 171 का है, जहां टेकऑफ के कुछ ही मिनटों बाद दोनों इंजन बंद हो गए। शुरूआती जांच में ईंधन नियंत्रण सिस्टम में गड़बड़ी की आशंका जताई गई।
इंसानी गलती अब भी सबसे बड़ा जोखिम
तकनीक चाहे जितनी भी आधुनिक हो, इंसानी गलती आज भी एयर क्रैश या हादसे का सबसे बड़ा कारण बनी हुई है। कभी कॉकपिट में चेकलिस्ट ठीक से न पढ़ने पर, कभी टेकऑफ से पहले सेटिंग्स में चूक हो जाने पर
छोटी गलतियां बड़े हादसों में बदल सकती हैं। इसके साथ ही, लंबी ड्यूटी, स्टाफ की कमी और थकान भी फैसले लेने की क्षमता पर असर डालती है।
तकनीक के साथ आते हैं साइबर खतरे
विमानन इंडस्ट्री अब डिजिटल तकनीकों पर ज़्यादा निर्भर हो चुकी है। ऐसे में सिस्टम हैक होने, नेविगेशन में जीपीएस से छेड़छाड़, एयर ट्रैफिक कंट्रोल में आईटी आउटेज जैसी घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। ये सीधे-सीधे उड़ानों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।
सप्लाई चेन और स्टाफ की कमी से दबाव
महामारी के बाद विमानन क्षेत्र तेजी से तो रिकवर हुआ है, लेकिन इसके साथ नई समस्याएं भी सामने आईं एयरक्राफ्ट के पुर्जों की सप्लाई में देरी, प्रशिक्षित तकनीशियनों की कमी ज्यादा उड़ानों की डिमांड लेकिन स्टाफ सीमित इन वजहों से ऑपरेशनल दबाव बढ़ा है, जो कभी-कभी सुरक्षा मानकों को भी प्रभावित कर सकता है।
क्या हो रहे हैं सुधार?
सुरक्षा को मजबूत करने के लिए DGCA (भारत) और EASA (यूरोप) जैसी एजेंसियां लगातार नए प्रोटोकॉल जारी कर रही हैं।
पायलट ट्रेनिंग पर ज़ोर
टेक्निकल इंस्पेक्शन की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई गई
साइबर सुरक्षा के लिए नए सॉफ्टवेयर
हालांकि ज़मीन पर इन सुधारों का असर दिखने में वक्त लगता है, लेकिन गंभीर हादसों से बचने के लिए यह बेहद ज़रूरी है।
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