Milk Industry: हॉस्पिटैलिटी और फूड कॉमर्स सेक्टर के बाद क्या LPG सप्लाई को लेकर चल रही अनिश्चितता का असर डेयरी इंडस्ट्री पर भी पड़ेगा? महाराष्ट्र की कई डेयरियों ने दूध की प्रोसेसिंग और पाश्चराइजेशन में आई सुस्ती के साथ-साथ दूध के पैकेट और कार्टन की कमी को लेकर चिंता जताई है। बताया जा रहा है कि पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध की वजह से पैदा हुए एनर्जी संकट के चलते इनके प्रोडक्शन पर बुरा असर पड़ा है।

न्यूज18 मराठी की रिपोर्ट के मुताबिक कई डेयरी ऑपरेटरों और मालिकों के हवाले से बताया है कि दूध के पैकेट और कार्टन बनाने वाली फैक्टरियों को गैस की पर्याप्त सप्लाई नहीं मिल पा रही है, जिससे प्रोडक्शन प्रभावित हो रहा है। इसके चलते दूध प्रोडक्शन इंडस्ट्री में कमी आ गई है।
एक डेयरी के संस्थापक ने मीडिया को बताया कि दूध के पैकेट और कार्टन अभी आसानी से मौजूद नहीं हैं, क्योंकि उन्हें बनाने वाली फैक्ट्रियों के पास गैस की पर्याप्त सप्लाई नहीं है। आगे कहा कि मौजूदा सप्लाई सिर्फ 10 दिनों तक ही चलेगी।
होटलों, रेस्टोरेंटों और थोक ग्राहकों की तरफ से दूध की मांग भी कम हो गई है, क्योंकि LPG सप्लाई की कमी के चलते कई कमर्शियल किचन को अपने मेन्यू में कटौती करनी पड़ रही है। नतीजतन, स्थानीय डेयरियों को भैंस और गाय का दूध कम कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
दूसरे सप्लायर ने कहा कि प्लास्टिक पैकेटों की कमी की पुष्टि की और कहा कि अगर जल्द ही सप्लाई सामान्य स्तर पर नहीं लौटी, तो डेयरी उद्योग को अगले 10 दिनों में एक बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है।
बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि हाल ही में भैंस के दूध के तीन बड़े ऑर्डर रद्द कर दिए गए, जिसके चलते जमा दूध को कम कीमतों पर बेचना पड़ा। छोटी डेयरियां ज्यादा दूध जमा करके नहीं रख सकतीं, इसलिए उन्हें ज्यादा बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
हालांकि, ऐसा नहीं लगता कि सभी डेयरी उत्पादक इससे प्रभावित हुए हैं। अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर ने मीडिया को बताया कि यह मिल्क कोऑपरेटिव रोजाना लगभग 35 मिलियन लीटर दूध प्रोसेस करता है। उनकी गैस की लगभग 80% जरूरतें पूरी हो जाती हैं, और बाकी जरूरतें डीजल और दूसरे ईंधनों से पूरी की जाती हैं। अमूल के पास पैकेजिंग मटीरियल की भी कोई कमी नहीं है, क्योंकि वे दूध और दही के लिए अपने पैकेट खुद ही बनाते हैं।
कीमतों में बढ़ोतरी डेयरी उत्पादन को, गंभीर मुश्किल में डाल रही है। हाल ही में, खेतों के प्रबंधन के लिए जरूरी कच्चे माल को खरीदने की लागत में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पशुओं का चारा, ऊर्जा, ईंधन, सेवाएं और अस्तबलों को चलाने के लिए जरूरी सामग्री, इन सभी की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है, लगभग 30-40%, जिसका कंपनियों के बजट पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।
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