नयी दिल्ली। कोरोनावायरस के खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 22 मार्च को लोगों से घरों में रहने की अपील की है। इसे जनता कर्फ्यू का कनाम दिया गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही मंदी की गिरफ्त में है, ऐसे में लोगों के घरों में रहने से कारोबार और कम होगा, जिसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। सेवा क्षेत्र, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी का लगभग 55 फीसदी हिस्सा है, को सबसे अधिक झटका लगने के आसार हैं। पीएम ने कंपनियों से कहा है कि वे कर्मचारियों को अधिक समय तक घर से काम करने की अनुमति दें। इसके अलावा देश के बड़े अनौपचारिक क्षेत्र में सोशल डिस्टेंसिंग उपायों से नौकरी या वेतन के नुकसान के कारण उत्पादकता और उपभोग में कमी आ सकती है। जानकारों का अनुमान है कि अगर कोरोना का खतरा व्यापक समुदाय तक फैला तो 1 अप्रैल से शुरू होने वाले वित्त वर्ष में जीडीपी 3.5 फीसदी तक गिर सकती है।

11 सालों के निचले स्तर पर पहुंच सकती है विकास दर
सिकुड़ता आउटपुट अर्थव्यवस्था में ग्रोथ रेट को और बिगाड़ सकता है, जिसके पहले से ही 31 मार्च को खत्म हो रहे वित्त वर्ष में 5 फीसदी के 11 सालों के निचले स्तर पर फिसलने की संभावना है। वायरस के प्रकोप से पहले भारत ने अगले वित्त वर्ष में 6-6.5 फीसदी तक की विकास दर का अनुमान लगाया था। मगर अब एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स और फिच रेटिंग्स ने पहले ही विकास दर में 50 आधार अंकों की कटौती का अनुमान लगाया है। मौजूदा सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय से एयरलाइंस, होटल, मॉल, मल्टीप्लेक्स, रेस्तरां और खुदरा विक्रेता गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।
जीडीपी का सबसे बड़ा घटक है खपत
खपत जीडीपी का सबसे बड़ा कंपोनेंट है, मगर मजबूरी में किये जा रहे लॉकडाउन से इकोनॉमी पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। इस समय देश के बड़े गरीब तबके के पास नकदी की किल्लत होगी और ऐसे में सरकार को उन्हें आर्थिक सहायता देनी होगी। हालात ऐसे होते जा रहे हैं कि लोग अपने लिए सामान जमा कर रहे हैं। सरकार ने भी गरीबों को 6 महीने का राशन एक साथ देने का ऐलान कर दिया है।


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