Holi Festival Gulal Gote: होली के त्योहार में अब सिर्फ कुछ दिन बचे हैं। इसको लेकर तैयारियां बड़े जोरों के साथ की जारी हैं। राजपूतों के समय से चली आ रही परंपरा गुलाल गोटे से होली खेलने की वो आज भी उसी तरह जारी है। इन दिनों जयपुर के बाजारों में रजवाड़ी गुलाल गोटे दिखने लग गए हैं। जयपुर के मनिहारों की गली में ये गुलाल गोटों बनते हैं और वहीं से बिकते हैं।

इन गुलाल गोटों के पीछे एक अच्छी कहानी है क्योंकि इन्हें बनाने वाले मुस्लिम परिवार हैं और खरीदार हिन्दू समुदाय के लोग हैं। जो आपसी भाईचारे को भी बढ़ावा देता है। गुलाल गोटों की खरीदारी के बाद होली वाले दिन लोग इनसे खेलते हैं।
हमने रेड हार्ट ऑर्गेनाइजेशन के हिमांशु वर्मा से बात करके इस बारे में अन्य जानकारी भी हासिल की है। हिमांशु ने बताया कि जयपुर में गुलाल गोटे की शुरुआत लगभग 18वीं शताब्दी से हुई थी। उन्होंने बताया गुलाल गोटे जयपुर की ओरिजिनल पहचान नहीं है क्योंकि इसकी शुरुआत व्रज के क्षेत्र मथुरा और बनारस में हुई थी। हालांकि, बाद में ये जयपुर पहुंची। जब से अभी तक लोग गुलाल गोटे के साथ होली का त्योहार खेलना पसंद करते हैं।
हिमांशु ने ये भी बताया कि गुलाल गोटे की डिमांड तो पूरे देश से होती है लेकिन इसे पहुंचाना अपने आप में बहुत बड़ा टास्क है। गुलाल गोटे फ्लाइट से भी नहीं भेजे जा सकते क्योंकि इसे लेकर जाना मना है।
जयपुर में अमजद खान का परिवार गुलाल गोटा बनाने के काम मे करीब सात पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। जयपुर में गुलाल गोटे की शुरुआत के पीछे एक ये भी तथ्य है कि जब राजाओं ने जयपुर के कारीगरों से होली के अवसर पर कुछ खास इंतजाम करने की डिमांड की थी। वहीं, उन कारीगरों के माध्यम से लाख से बनी हुई गोल गेंद को बनाया गया और उसमें सूखा रंगा भरा गया जिसे बाद में गुलाल गोटे का नाम दिया गया।
जयपुर में लाख से बने हुए उत्पादों की मांग सिर्फ जयपुर तक ही सीमित नहीं बल्कि इसकी डिमांड पूरे देश में फैली हुई है। मनिहार समुदाय के लोग लाख के सामान बनाने के माहिर भी माने जाते हैं। जयपुर में लाख की बनी चूड़ियों की मांग भी ज्यादा रहती है। जयपुर में लगभग 300 से ज्यादा मुस्लिम परिवार लाख के काम से जुड़े हुए हैं जिसमें सिर्फ वे गुलाल गोटे ही नहीं बनाते हैं बल्कि अलग-अलग सामान भी बनाते हैं। ये मुस्लिम परिवार सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्होंने पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रख रखा है। जयपुर में तैयार हुए गुलाल गोटे देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं।
गुलाल गोटे की एक खासियत ये भी है कि ये बेहद ही नाजुक होते हैं जो हल्के से उतार चढ़ाव में टूट जाते हैं। इसलिए इन्हें डिलिवर करना बहुत मुश्किल हो जाता है। गुलाल गोटे और लाख के काम के लिए जयपुर को मुख्य केंद्र के रूप में देखा जाता है।
देश-विदेश तक गुलाल गोटे की डिमांड
होली के त्योहार करीब आते ही गुलाल गोटे की डिमांड में काफी ज्यादा वृद्धि हो जाती है। गुलाल गोटे बनाने वाले कारीगर कहते है इसकी मांग बहुत ज्यादा हो जाती है और हम लोग इसकी पूर्ति नहीं कर पाते हैं क्योंकि गुलाल गोटे बनाने में थोड़ा अधिक समय लगता है, और इसे बनाने में काफी ज्यादा मेहनत लगती है।
गुलाल गोटे बनाने के लिए सबसे पहले लाख को पिघलाना पड़ता है और बाद में इसे गोल आकार में तैयार किया जाता है। वहीं, फिर सूखा गुलाल भरा जाता है। इन गुलाल गोटे से सिर्फ राजा और महाराजा होली खेला करते थे, लेकिन समय के मुताबिक अब इसे आम लोग खेलते हैं। गुलाल गोटे की मांग केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में बहुत ज्यादा है क्योंकि ये गुलाल गोटे अपने आप में बेहद ही लुभावनीय होते हैं।


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