FPI Inflows: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी मार्केट में निवेश जारी रखा है. अगस्त में भी लगातार तीसरे महीने नेट खरीदारी रहे. लेकिन कई घरेलू और वैश्विक ट्रिगर्स की वजह से निवेश की रफ्तार धीमी रही. अगस्त में FPI ने भारतीय इक्विटी में 7,320 करोड़ रुपए (1.02 बिलियन डॉलर) का निवेश किया. जबकि 30 अगस्त तक नेट इनवेस्टमेंट 25,493 करोड़ रुपए रहा, जिसमें डेट, हायब्रिड, डेट-VRR और इक्विटी शामिल है. अगस्त महीने में नेट इवेस्टमेंट में 17,960 करोड़ रुपए डेट मार्केट में निवेश किया गया. बता दें कि जुलाई में FPIs ने 32,365 करोड़ रुपए का निवेश किया था.
FPIs की रफ्तार की क्यों पड़ी धीमी?
भारतीय शेयर बाजार का हाई वैल्युएशन की वजह से FPIs की रुचि कम कम हई है. निफ्टी का अनुमानित FY25 की अर्निंग 20 गुना से ऊपर कारोबार कर रहा है, जोकि ग्लोबल लेवल पर सबसे महंगा मार्केट बन गया है. ऐसे में FPIs कहीं और ज्यादा सस्ता ऑप्शन तलाश रहे हैं.
FPIs पर ग्लोबल ट्रिगर्स का असर
24 अगस्त को येन कैरी ट्रेड के खत्म होने से भी FPIs पर असर पड़ा, जिससे भारतीय इक्विटी में भारी बिकवाली हुई. इसके अलावा, अमेरिका में संभावित मंदी की बढ़ती आशंकाओं और कमजोर आर्थिक आंकड़ों ने बाजार की चाल पर असर डाला.

अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कटौती की संभावना से भी FPIs के फ्लो पर असर हो रहा है. इससे इमर्जिंग मार्केट को फायदा मिलने की उम्मीद है. हालांकि, भारत को इन प्रवाहों से बहुत अधिक फायदा नहीं मिल सकता है.
FPIs फ्लो पर घरेलू ट्रिगर्स
टैक्स नियमों में बदलाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. कैपिटल गेन टैक्स में बढ़ोतरी और इंडेक्सेशन फायदे को हटाने से निवेशकों पर कर का बोझ बढ़ गया है.
स्थिर भारतीय रुपया और डेट मार्केट में आकर्षक ब्याज दरों की वजह से FPIs तेजी से डेट ऑप्शन की ओर रुख कर रहे हैं. यह बदलाव जारी रहने की उम्मीद है क्योंकि भारत एक महंगा मार्केट बना हुआ है, जिससे FPI अपना निवेश बेचकर सस्ते बाजारों में ट्रांसफर कर रहे हैं.
भविष्य के लिए अहम ट्रिगर्स
FPIs फ्लो घरेलू राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक इंडिकेटर्स, वैश्विक ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, मार्केट वैल्युएशंस, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और डेट मार्केट के अट्रैक्शन समेत अलग-अलग असर ट्रिगर्स से प्रभावित होगा.
FPI के बीच बिकवाली का रुझान जारी रहने की संभावना है, क्योंकि वे अन्य बाजारों में बेहतर वैल्यु की तलाश कर रहे हैं. हाई वैल्युएएशन और बदलते टैक्स नियमों के संयोजन ने भारत को वैश्विक स्तर पर उपलब्ध अन्य विकल्पों की तुलना में कम आकर्षक बना दिया है.
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