नयी दिल्ली। कोरोनावायरस और इसे फैलने से रोकने के लिए विभिन्न देशों में लगे लॉकडाउन के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। दुनिया के सामने अब तक तक की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी का संकट है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। कोरोनावायरस ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह झटका दिया है। इसी झटके को देखते हुए भारत के प्रमुख कारोबारी संगठन भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल (एसोचैम) ने कहा है कि कोरोनावायरस के कारण ग्लोबल आर्थिक मंदी से निपटने के लिए राहत पैकेज इस वक्त की बड़ी जरूरत है। एसोचैम के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था को इस संकट के समय सहारे के लिए 200 अरब डॉलर की जरूरत होगी। इसमें से 50 से 100 अरब डॉलर कैश की जरूरत अगले तीन महीनों में होगी ताकि नौकरियों के नुकसान को नियंत्रित करने और इनकम में घाटे की भरपाई की जा सके।
जीएसटी में कटौती पर हो विचार
एसोचैम ने सुझाव दिया है कि सरकार को 3 महीनों के लिए जीएसटी की सभी स्लैब में 50 फीसदी तक की कटौती करनी चाहिए, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए 25 फीसदी जीएसटी घटाया जाना चाहिए। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लिखे एक सुझाव पत्र में एसोचैम के अध्यक्ष डॉ निरंजन हीरानंदानी ने कोविड-19 महामारी से देश की लड़ाई में अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए कई उपायों का प्रस्ताव दिया है। एसोचैम ने साफ कहा है कि 300 अरब डॉलर तक जाने की क्षमता के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को अगले 12-18 महीनों में 200 अरब डॉलर की जरूरत होगी।
कारोबारों और वर्कर्स को मिलेगी मदद
एसोचैम अध्यक्ष के मुताबिक इस राहत आर्थिक पैकेज से कारोबारों और वर्कर्स को संकट की चुनौती से पार पाने में मदद मिलेगी। जीएसटी में कटौती के सुझाव के साथ ही एसोचैम ने कहा है कि फाइनल जीएसटी बकाया 6 तिमाही किस्तों में अदा किया जाना चाहिए और वो भी बिना किसी ब्याज के। इसकी शुरुआत अक्टूबर 2020 से होनी चाहिए। इसके अलावा वित्त वर्ष 2019-2020 के लिए अंतिम इनकम टैक्स और वित्त वर्ष 2020-2021 के लिए अग्रिम कर भी बिना ब्याज के अक्टूबर 2020 से छह तिमाही तक देय होना चाहिए।
100 सालों की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी
वित्तीय जानकार बता रहे हैं कि कोरोना संकट ग्लोबल इकोनॉमी में 100 सालों की सबसे बड़ी गिरावट की तरफ बढ़ रहा है। वैसे सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने लंबा चलता है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक चला तो यह निश्चित रूप से सभी वित्तीय संकटों से बड़ा होगा। जानकार मौजूदा स्थिति के मुकाबले 2008 की मंदी को सिर्फ एक सूखा मान रहे हैं। विकासशील देशों में स्थिति काफी गंभीर दिख रही है, जिसमें इस साल पैसा निकाले जाने से पहले भारी मात्रा में निवेश आया है। मुद्राएं कमजोर हो रही, लोग आयातित खाद्य और ईंधन के लिए अधिक भुगतान करने के लिए मजबूर हैं और सरकारों के सामने दिवालिया होने का खतरा है।


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