चीन का ‘सी टर्टल मॉडल’ बनेगा H-1B वीजा फीस से परेशान भारतीयों का सहारा! भारत पलट सकता है ट्रम्प की चाल?

Sea Turtle Model India: ट्रम्प सरकार ने H-1B वीजा की फीस में 10 गुना वृद्धि करके 1 लाख डॉलर यानी 88 लाख रुपए कर दी है। इस फैसले के बाद से भारतीय IT कंपनियां और प्रोफेशन में जबरदस्त असर पड़ता दिख रहा है। अब इस समय भारत के सामने ऐसा मोड बनकर खड़ा हो गया है जो भारत को चुनौती भी करता है और मौका भी देता है।

China Sea Turtle Model

H-1B वीजा फैसले के बाद चीन अपने यहां से गए प्रवासी प्रोफेशन को "सी टर्टल मॉडल" के तहत वापस बुला रहा है क्या भारत भी इस मॉडल के तहत बुला सकता? चलिए आपको बताते हैं चीन के इस मॉडल के बारे में अगर भारत इसको लागू करता है तो क्या फायदा मिलेगा।

ट्रम्प ने भारतीयों को दिया झटका

राष्ट्रपति ट्रम्प ने शुक्रवार (19 सितंबर, 2025) को H-1B वीजा के नियमों में बदलाव करते हुए एप्लीकेशन फीस में इजाफा कर दिया है। ट्रम्प ने H-1B वीजा के लिए नए एप्लीकेशन पर 100,000 डॉलर फीस लगाने का ऐलान कर दिया है और साइन किए यानी अब भारतीयों को वीजा के आवेदन के लिए 88 लाख रुपए खर्च करने होंगे।

इसका असर सबसे ज्यादा भारतीय की बड़ी आईटी कंपनियां जैस Infosys, TCS, HCLTech, Wipro और Tech Mahindra पर पड़ता दिख रहा है। इसके बाद अब इन कंपनियों को सालाना 1300 करोड़ रुपए से लेकर 4800 करोड़ रुपए तक और खर्च करना पड़ेगा।

इन-इन कंपनियों उठाना पड़ेगा भार

H-1B वीजा फीस में हुए इजाफे का असर सबसे ज्यादा भारतीय आईटी कंपनियों में देखने को मिल रहा है क्योंकी भारतीय कंपनियां भारत से कर्मचारियों को लेकर जाती है। Infosys में 2004 कर्मचारी इस वीजा के तहत काम कर रहे हैं। वहीं, कंपनी को अब पहले के मुकाबले 200 मिलियन डॉलर यानी 1764 करोड़ रुपए का और ज्यादा भार उठान पड़ेगा। TCS के भी 5505 कर्मचारी H-1B वीजा पर काम कर रहे हैं, जिसमें कंपनी को अब सालाना 550 मिलियन डॉलर यानी 4852 करोड़ रुपए अतिरिक्त पेय करने होंगे। Tech Mahindra भी इस कड़ी में है जिसे 951 कर्मचारियों के लिए 95 मिलियन डॉलर यानी 838 करोड़ रुपए और देने होंगे। वहीं Wipro को 1523 कर्मचारियों के लिए 152 मिलियन डॉलर यानी 1341 करोड़ रुपए अतिरिक्त पेय करने होंगे।

रेमिटेंस पर संकट का साया

विदेशों से हर साल भारत लगभग 125 अरब डॉलर रेमिटेंस की कमाई करता है, इसमें करीब 35 अरब डॉलर यानी 28% हिस्सेदारी सिर्फ और सिर्फ अमेरिका से आती है। अगर H-1B वीजा के कारण भारतीयों के नई इंट्री रुक जाएगी तो इसका असर भारत पर पड़ता दिख सकता है क्योंकी हर साल 400 मिलियन डॉलर यानी 3300 करोड़ का नुकसान हो सकता है।

H-1B वीजा अपडेट की वजह से पहले ही भारतीय रुपया दवाब में बना हुआ है। हाल में रुपया 0.23 फीसदी टूटकर 88.31 प्रति डॉलर तक गिर गया, जिससे उस पर दवाब देखने को मिल रहा है।

चीन का "सी टर्टल मॉडल"

चीन ने अपने प्रवासी टैलेंट को वापस लाने के लिए "थाउजेंड टैलेंट्स प्लान" और "सी टर्टल मॉडल" जैसे कदम उठाए थे। इसमें विदेशों से पढ़ाई और अनुभव लेकर लौटे प्रोफेशनल्स को विशेष सुविधाएं दी गईं, जैसे रिसर्च के लिए भारी फंडिंग, टैक्स छूट, मकान सब्सिडी, आसान वीजा और प्रशासनिक सहयोग इन लौटे हुए "सी टर्टल्स" ने चीन को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक, इंटरनेट और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया।

भारत के लिए क्यों जरूरी है ऐसा मॉडल?

भारत इस समय तेजी से स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी हब के रूप में उभर रहा है। देश में 100 से ज्यादा यूनिकॉर्न और 1.5 लाख से ज्यादा स्टार्टअप्स चालू हैं। "मेक इन इंडिया," "स्टार्टअप इंडिया," और "PLI स्कीम" जैसी सरकारी पहलें भी टेक सेक्टर को मजबूती दे रही हैं।

अगर भारत चीन की तरह प्रवासी टैलेंट को वापस लाने का मॉडल अपनाए तो लाखों भारतीय प्रोफेशनल्स अपने अनुभव और नेटवर्क का इस्तेमाल देश की प्रगति में कर सकते हैं। यह न केवल टेक्नोलॉजी सेक्टर को मजबूत करेगा बल्कि रोजगार और रिसर्च के नए अवसर भी पैदा करेगा।

भारत क्या कदम उठा सकता है?

टैक्स छूट और आवास सब्सिडी देकर प्रवासी पेशेवरों को भारत लौटने के लिए प्रोत्साहित करना।

रिसर्च फंडिंग और वेंचर कैपिटल को बढ़ाकर हाई-रिस्क प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट करना।

यूनिवर्सिटी-इंडस्ट्री कोलैबोरेशन को मजबूत करना, ताकि विदेशी रिसर्चर्स और एनआरआई प्रोफेशनल्स भारतीय संस्थानों से जुड़ें।

स्टार्टअप-फ्रेंडली माहौल बनाने के लिए गवर्नेंस और रेगुलेशन को आसान करना।

नए क्षेत्रों जैसे एआई, बायोटेक और ग्रीन टेक्नोलॉजी में ग्लोबल रिसर्च हब बनाने पर फोकस करना।

H-1B वीजा का महंगा होना भारत के लिए बड़ी चुनौती है। आईटी कंपनियों के खर्च बढ़ेंगे और रेमिटेंस पर असर पड़ सकता है। लेकिन यदि भारत "सी टर्टल मॉडल" अपनाकर प्रवासी टैलेंट को आकर्षित करे, तो यह मुश्किल एक बड़े अवसर में बदल सकती है। इससे भारत न केवल अपने टेक सेक्टर को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर खुद को एक हाई-टेक पावर के रूप में स्थापित कर सकेगा।

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