नयी दिल्ली। भारतीय परिवारों की शुद्ध वित्तीय संपत्ति (Net Financial Assets) वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी की 7.7 फीसदी हो गई। यह दिखने में एक अच्छी बात लगती है, मगर यदि आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो दरअसल से परिवारों के बैंक के से कम कर्ज लेने के कारण ऐसा हुआ, जो अर्थव्यवस्था में मंदी और कमजोर भावनाओं को दर्शाता है। आइये जानते हैं इस पूरे मामले के गुणा-गणित को।
क्या होती हैं शुद्ध वित्तीय संपत्ति
शुद्ध वित्तीय संपत्ति, सकल वित्तीय संपत्तियों (जमा और निवेश) और कम वित्तीय देनदारियों (उधार) के बीच का अंतर है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि मार्च 2020 में समाप्त हुए वित्त वर्ष में वित्तीय वर्ष में शुद्ध वित्तीय संपत्ति पिछले वित्त वर्ष में जीडीपी की 7.2 फीसदी (13.73 लाख करोड़ रुपये) से बढ़ कर 7.7 फीसदी (15.62 लाख करोड़ रुपये) की हो गई। वित्त वर्ष 2018-19 में जहां सकल वित्तीय संपत्ति (जीएफए) 21.23 लाख करोड़ रुपये बढ़कर 21.63 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, वहीं वित्तीय देनदारियां (एफएल) 7.5 लाख करोड़ रुपये से गिर कर 6.01 लाख करोड़ रुपये पर आ गई, जो शुद्ध वित्तीय संपत्ति में बढ़ोतरी का कारण बना। जीडीपी के प्रतिशत के मामले में 2018-19 से 2019-20 में जीएफए 11.1 प्रतिशत से घट कर 10.6 प्रतिशत और एफएल 3.9 प्रतिशत से घट कर 2.9 प्रतिशत पर आ गई।
वित्तीय देनदारियों में गिरावट का क्या है मतलब
आरबीआई के अनुसार 2019-20 के दौरान कुल देनदारियों में बैंकिंग क्षेत्र से लोन में भारी गिरावट आर्थिक मंदी और बैंकों के जोखिम से बचने को भी दर्शाता है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि आर्थिक मंदी है और लोगों की इनकम या तो बढ़ नहीं रही या फिर घट रही है, ऐसे में फाइनेंशियल सेक्टर लोन देने में अधिक सतर्कता बरतेगा और यही कारण है का आय स्तर या तो नीचे जा रहा है या नहीं बढ़ रहा है, इसलिए वित्तीय क्षेत्र ऋण देने में उच्च सावधानी बरतेंगे और यही कारण है कि परिवारों की वित्तीय देनदारियों में गिरावट आई है। यह अर्थव्यवस्था में मंदी को दिखाता है।
क्या भारतीय परिवार अधिक बचत कर रहे हैं
कुल बचत नहीं बढ़ी है। पर डेटा पर करीबी नज़र डालें तो से पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में लोगों के पैसे जमा करने के उपकरणों में बदलाव आया है। जैसे कि 2019 में मार्च समाप्ति पर जीडीपी के प्रतिशत के रूप में बैंकों में घरेलू बचत 3.8 प्रतिशत थी, जो मार्च 2020 तक घट कर 3.4 प्रतिशत रह गई। इसकी बड़ी वजह पिछले 18 महीनों में आरबीआई द्वारा रेपो दर में कटौती के बाद बैंकों की तरफ से अपनी ब्याज दरों में कटौती करना है। वहीं दूसरी तरफ छोटी बचत योजनाओं में अधिक ब्याज मिलना बरकरार है और इसमें परिवारों की जमा पूंजी जीडीपी के 1.1 फीसदी से बढ़ कर 1.3 फीसदी हो गई है। करेंसी के रूप में लोगों की संपत्ति भी इसी अवधि में 1.5 प्रतिशत से घटकर 1.4 प्रतिशत रह गई। मगर लॉकडाउन की घोषणा के बाद से लोगों के पास करेंसी बढ़ी है। 27 मार्च 2020 को समाप्त सप्ताह में लोगों के पास 23.41 लाख करोड़ रुपये की नकदी थी, जो 22 मई 2020 तक 25.12 लाख करोड़ रुपये हो गई।
घरेलू बचत बढ़ने की उम्मीद है या नहीं
आरबीआई के एक रिपोर्ट "Quarterly Estimates of Households" के अनुसार कि कई अध्ययनों से पता चलता है कि लोग मंदी और इनकम की अनिश्चितता के दौरान अधिक बचत कर रहे हैं। आरबीआई ने उम्मीद जताई है कि मंदी और इनकम अनिश्चितता के चलते लोगों की बचत में बढ़ोतरी होगी। आगे लॉकडाउन के कारण खपत में तेज गिरावट के के चलते 2020-21 की पहली तिमाही में परिवारों की शुद्ध वित्तीय संपत्ति में बढ़ोतरी की भी संभावना है।
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