RBI : नहीं घटाईं ब्याज दरें, रेपो रेट 4 फीसदी पर कायम

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ने मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक के बाद बताया है कि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आज आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने रेपो रेट की दरों का ऐलान किया। पिछली मीटिंग में भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इस प्रकार रेपो रेट अभी भी 4 फीसदी पर ही कायम रहेंगी। वैसे जानकारों को इस बार रेपो रेट में कटौती की उम्मीद भी नहीं थी, और ऐसा ही हुआ है। इस प्रकार रेपो रेट 4 फीसदी और रिवर्स रेपो रेट 3.35 फीसदी बना रहेगा। आरबीआई फरवरी 2019 से अब तक रेपो रेट में 2.50 फीसदी की बड़ी कटौती कर चुका है।

RBI Governor Shaktikanta Das

चौथी तिमाही में जीडीपी पॉजिटिव होगी

मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की समीक्षा बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार दिखाई दे रहा है। हालांकि, यह सुधार एक समान नहीं है। दास ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर कहा कि सकारात्मक संकेत दिख रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि चौथी तिमाही तक जीडीपी दर पॉजिटिव हो जाएगी। वहीं आरबीआई गवर्नर ने कहा कि खरीफ फसल की बुवाई पिछले साल के मुकाबले बढ़ गई है, जिससे अनाज उत्पादन के रिकॉर्ड स्तर पर रहने की उम्मीद है।

मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी में शामिल हुए 3 नए सदस्य

केन्द्र सरकार ने मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) में 7 अक्टूबर को 3 नए सदस्यों को नियुक्त किया था। इससे पहले पुराने सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने की वजह से पॉलिसी रिव्यू को टालना पड़ा था। पहले पॉलिसी रेट का ऐलान 1 अक्टूबर को होने वाला था। इस बार कमिटी में तीन नए सदस्य हैं।

मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के 3 नए सदस्यों के नाम

शशांक भिडे : भिडे नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च में वरिष्ठ सलाहकार हैं। शशांक ने कृषि अर्थशास्त्र में पीएचडी की है। वह बंगलुरू में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य के रूप में भी कार्य करते हैं।

अशीमा गोयल : इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च में प्रोफेसर हैं। गोयल के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में अर्थव्यवस्था पर 100 से अधिक लेख छपे हैं। उन्होंने मैक्रोइकॉनॉमिक्स और मार्केट्स इन डेवलपिंग एंड इमर्जिंग इकोनॉमीज और भारतीय अर्थव्यवस्था की एक संक्षिप्त पुस्तिका सहित कई पुस्तकों का लेखन और संपादन भी किया है.

जयंत आर वर्मा : वर्मा इंडीयन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद में प्रोफेसर हैं।

मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब

रेपो रेट

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।

रिवर्स रेपो रेट

जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।

सीआरआर

देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।

एसएलआर

जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।

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