भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल मानसून के सामान्य से कम रहने की आशंका जताई है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक, इस बार लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) की 92 फीसदी बारिश ही हो सकती है। इस अलर्ट ने खरीफ फसलों की बुवाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। देश के कई हिस्सों में पानी की किल्लत की आशंका को देखते हुए किसान और सरकार अभी से तैयारियों में जुट गए हैं।
कम बारिश का सीधा असर खेती की पैदावार पर पड़ सकता है। जलाशयों में पानी का स्तर घटने से उन इलाकों में सिंचाई मुश्किल हो जाएगी जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ जाते हैं, जिससे महंगाई कम करने के RBI के लक्ष्य को झटका लग सकता है। बाजार भी ग्रामीण मांग में सुस्ती और बढ़ती महंगाई को लेकर सतर्क नजर आ रहा है।

2026 के मानसून पर अल नीनो (El Niño) का असर
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो की वजह से आमतौर पर मानसूनी बारिश कम हो जाती है। तापमान बढ़ने और सिंचाई की जरूरतें बढ़ने से बिजली की डिमांड भी बढ़ेगी। आने वाले महीनों में FMCG और पावर सेक्टर के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। बारिश की कमी से निपटने के लिए कई राज्य सरकारें अभी से वॉटर कंजर्वेशन प्लान पर काम कर रही हैं।
| असर | जोखिम का स्तर | मुख्य चिंता |
|---|---|---|
| बुवाई | ज्यादा | पैदावार |
| कीमतें | बढ़ी हुई | महंगाई |
| डिमांड | सुस्ती | FMCG सेक्टर |
खरीफ की बुवाई और खाने-पीने की चीजों के दाम पर खतरा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मानसून की चाल पर पैनी नजर रखे हुए है। अगर बारिश कम होती है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों को ऊंचा रखना पड़ सकता है। इसका मकसद कम पैदावार की वजह से बढ़ने वाली महंगाई को काबू में रखना है। जानकारों का मानना है कि दालों और तिलहन की बुवाई से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सेहत का पता चलेगा।
हालांकि 92 फीसदी बारिश का अनुमान चिंताजनक है, लेकिन यह भी देखना होगा कि बारिश किन इलाकों में कितनी होती है। अगर कम बारिश भी सही समय पर हो, तो कुछ क्षेत्रों में फसल को सहारा मिल सकता है। अब सबकी नजरें मई के आखिर में आने वाले IMD के अगले अपडेट पर टिकी हैं। फिलहाल पूरा जोर पानी के सही मैनेजमेंट और बाजार में कीमतों को स्थिर रखने पर है।


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