नयी दिल्ली। बजट 2020 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विभिन्न कानूनों को डिक्रिमिनलाइज (अपराध की श्रेणी बाहर) करने के केंद्र के इरादे की जानकारी दी थी। अब इन मामलों को सिविल मामलों की कैटेगरी में लाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। नियमों के उल्लंघन की इस कैटेगरी को सबसे पहले वित्तीय सेक्टर में लाए जाने पर विचार किया जा रहा है, जहाँ चेक बाउंसिंग आदि जैसे अपराधों को अब सिविल अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह फैसला कारोबार में आसानी बढ़ाने के साथ-साथ अदालती काम को कम करने के लिए भी है। इस तरह के अपराधों के लिए अब मौद्रिक भुगतान वसूला जाएगा। जेल और इस तरह की बाकी कार्रवाई को ऐसे मामलों में से हटा दिया जाएगा।

वित्तीय सेवा विभाग ने मांगे सुझाव
इसी के लिए डीओएफएस या वित्तीय सेवा विभाग ने 19 कानूनों में 39 सेक्शन को डिक्रिमिनेट करने के लिए जनता से सुझाव मांगे हैं। ये सेक्शन इसके प्रशासनिक क्षेत्र के भाग हैं, जैसे कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम, बीमा अधिनियम और परक्राम्य लिखत अधिनियम। डीएफएस ने इस प्रस्तावित कदम के पीछे तर्क देते हुए एक बयान में कहा कि प्रोसीजरल खामियों और मामूली गैर-अनुपालन को अपराध की कैटेगरी में रखने से व्यवसायों पर बोझ बढ़ जाता है। ऐसे में आवश्यक है कि उन प्रावधानों पर फिर से विचार करना चाहिए जो केवल प्रकृति में प्रक्रियात्मक हैं और बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक हित को प्रभावित नहीं करते हैं।
क्या है मौजूदा नियम
वर्तमान नियम के अनुसार चेक बाउंस होने पर 2 साल तक की जेल या जितने का चेक बाउंस हुआ है उसका 2 गुना तक जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं। बता दें कि अनधिकृत जमा योजना अधिनियम की धारा 3 का उल्लंघन करने के लिए सार्वजनिक जमा का उपयोग और आरबीआई अधिनियम की कुछ धाराओं के भी डिक्रिमिनलाइजेशन पर विचार किया जा रहा है। इस तरह की बाधाएं घरेलू और विदेशी निवेशक दोनों के कारोबार और निवेश में अड़चन बनती हैं। कोविंड-19 महामारी के बीच व्यवसायिक कामकाज को आसान बनाना वैसे भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।


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