नई दिल्ली, अगस्त 5। शुक्रवार को भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति ने उच्च मुद्रास्फीति को रोकने के लिए रेपो दर को 0.50 बेसिक पॉइंट बढ़ा कर 5.4 फीसदी कर दिया है। बढ़ती मंहगाई और विश्व बाजार में उतार चढ़ाव को देखते हुए रिजर्व बैंक ने पिछले 3 महीने में तीसरी बार रेपो दर बढ़ाया है। रेपो दर वह ब्याज दर है जिससे बैंक आरबीआई से लोन लेते है। आरबीआई देश में रुपए की आपूर्ति को पूरा करने के लिए बैंको को कम ब्याज पर लोन देती है।
रेपो रेट 0.50 फीसदी बढ़ाया
पैसों की आपूर्ति को रातोंरात बढ़ाया जा सकता है, लेकिन खरीदने योग्य सामान नहीं, जिसके उत्पादन के लिए काफी समय की आवश्यकता होती है। रेपो दर में 0.5 फीसदी की वृद्धि के दो व्यापक निहितार्थ हैं। सेबी से मान्यता प्राप्त निवेश सलाहकार विक्रम विश्वनाथन कहते है कि नए लोनकर्ता और मौजूदा रेपो दर से जुड़े दीर्घकालिक खुदरा ऋण महंगे हो जाएंगे।
जमा राशि पर उच्च रिटर्न
बैंक जिस ब्याज दर पर उधार लेते हैं, वह अब बढ़ जाएगी, पर्सनल लोन, ऑटो ऋण, होम लोन जैसे खुदरा ऋण महंगे हो जाएंगे। इसलिए, नए कर्जदारों की ईएमआई काफी बढ़ने वाली है। दूसरी तरफ, बैंक जमाकर्ताओं को उनकी जमा राशि पर उच्च रिटर्न मिलेगा, जो इस बात पर निर्भर करता है कि बैंक नई ब्याज दरों में बढ़ोतरी कैसे करते हैं। इन जमाओं में सावधि जमा शामिल हैं।
महंगाई को लेकर अनुमान
शुक्रवार को आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति "असुविधाजनक रूप से उच्च" बनी हुई है और "6 प्रतिशत से ऊपर रहने की उम्मीद है" रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 23 के लिए सीपीआई पूर्वानुमान को 6.7 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा। भारत की खुदरा मुद्रास्फीति लगातार दूसरे महीने कम हुई, लेकिन एक साल पहले जून में केवल 7.01 प्रतिशत की कमी आई, मंगलवार को आधिकारिक आंकड़ों से पता चला। उपभोक्ता कीमतें, जो मई में 7.04 प्रतिशत बढ़ीं, लगातार छठे महीने भारतीय रिज़र्व बैंक की 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा का उल्लंघन करती रहीं।


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