Saudi Arabia Vision 2030: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच जहां पूरी दुनिया कच्चे तेल के लिए सऊदी की तरफ भाग रही है, वहीं सऊदी अरब ने अचानक अपना फोकस बदल दिया है। तेल से हटकर अब वह एक नए सेक्टर में बड़ी एंट्री लेने जा रहा है। सऊदी अरब को दुनिया काले सोने यानी तेल का बादशाह कहती है। लेकिन अब सऊदी लाल धातु, यानी कॉपर, और पीले सोने यानी गोल्ड की तरफ तेजी से बढ़ रहा है।

इसकी वजह क्या है?
इसकी वजह साफ है कि दुनिया ग्रीन एनर्जी की तरफ जा रही है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, बैटरी, सोलर पैनल्स, विंड टरबाइन, इन सबकी धड़कन कॉपर है। ऐसे में सऊदी को लग रहा है कि तेल का जमाना धीरे-धीरे खत्म होगा। इसलिए उसे अपनी इकॉनमी को डायवर्सिफाई करना ही होगा। यह सब उसके मेगा प्लान विजन 2030 का हिस्सा है, जिसके तहत कॉपर और गोल्ड को देश की अर्थव्यवस्था का तीसरा बड़ा पिलर बनाया जा रहा है।
सऊदी का यह विजन 2030 आखिर है क्या?
विजन 2020 का मकसद तेल पर निर्भरता कम करना, नए सेक्टर्स खड़े करना और मिनरल इंडस्ट्री को बढ़ाना है। सरकार का दावा है कि उसके पास अनदेखे मिनरल रिजर्व है। जैसे फास्फेट, कॉपर और बॉक्साइट, जिसकी कीमत लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं दुनिया में ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन के चलते कॉपर की डिमांड 2030 तक 600% बढ़ने वाली है। यानी सऊदी के पास एक सुनहरा मौका है, और वह इस मौके को बिल्कुल भी जाने नहीं देना चाहता।
अब देखते हैं सऊदी के बड़े कदम। सऊदी माइनिंग रेवेन्यू को 2030 तक चार गुना करने की तैयारी में है। वही खुद को ग्लोबल माइनिंग हब बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह विदेशी कंपनियों को खुले दिल से लाइसेंस दे रहा है। भारतीय कंपनी वेदांता लिमिटेड को भी कॉपर और गोल्ड माइनिंग का लाइसेंस मिल चुका है। कैनेडियन कंपनी पहले से माइन चला रही है, ऑस्ट्रियन कंपनी को भी राइट्स मिल चुके हैं, और चीन तो लोकल पार्टनरशिप में तेजी से एक्सप्लोरेशन कर रहा है। सऊदी का मकसद साफ है। अगर कल को तेल से कमाई घटे, तो माइनिंग से उसकी भरपाई आराम से हो जाए।
भारत के लिए क्या है संभावना?
भारत के लिए इसमें बढ़त की संभावना है। जैसे-जैसे सऊदी अरब अपने फंडिंग सोर्स बढ़ाएगा, इंडियन बैंक, म्यूचुअल फंड और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर को सऊदी बॉन्ड और सिंडिकेटेड लोन तक ज्यादा एक्सेस मिल सकता है। इसके अलावा, इससे इंडियन पोर्टफोलियो में डायवर्सिटी आ सकती है।
जैसे-जैसे भारत खाड़ी देशों के साथ व्यापार और एनर्जी के रिश्ते मजबूत कर रहा है, बेहतर कैपिटल वाले सऊदी पार्टनर का मतलब हो सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा मजबूत निवेश, भारतीय सप्लायर के लिए ज्यादा भरोसेमंद पेमेंट, और बैंकिंग, एनर्जी और टेक्नोलॉजी में सहयोग के ज्यादा मौके। लेकिन रिस्क भी साथ है।
इसका असर भारत पर क्या पड़ेगा?
एक तरफ तो वेदांता को लाइसेंस मिलना भारत के लिए पॉजिटिव है, क्योंकि इससे कॉपर और गोल्ड सस्ते में भारत पहुंच सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ा झटका भी है। क्योंकि सऊदी जैसे बड़े खिलाड़ी अगर माइनिंग में कूदेंगे, तो ग्लोबल सप्लाई बढ़ेगी, लेकिन डिमांड उससे कई गुना तेज बढ़ रही है।
नए माइंस तैयार होने में 15 साल लग जाते हैं, पुराने माइंस खत्म हो रहे हैं...ऐसे में कॉपर की कीमत पहले ही आसमान छू रही है। भारत, जो ईवी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिन्यूएबल एनर्जी में बड़ा प्लेयर बन रहा है, उसे महंगे कॉपर का सीधा नुकसान झेलना पड़ सकता है। इससे EV से लेकर सोलर प्रोडक्ट्स तक सब महंगे हो सकते हैं।
कॉपर, जिसे रेड मेटल कहते हैं, आज इन्वेस्टमेंट का हॉट ऑप्शन बन चुका है। इस साल 20% से ज्यादा चढ़ गया है। ग्लोबली देखें तो चिली 23% प्रोडक्शन के साथ सबसे बड़ा खिलाड़ी है, फिर कांगो, ऑस्ट्रेलिया और चीन आते हैं। लेकिन डिस्कवर्ड कॉपर सिर्फ 2.8 मिलियन टन है, जबकि अनदेखे रिजर्व 3.5 मिलियन टन तक हो सकते हैं। यानी फ्यूचर ब्राइट है, लेकिन प्राइस हाई ही रहने वाले हैं। कुल मिलाकर, शॉर्ट टर्म में भारत को महंगे कॉपर का नुकसान हो सकता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में वेदांता जैसी पार्टनरशिप से बड़ा फायदा भी मिल सकता है।
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