King of the World Manufacturing and Supply: कोरिया में ट्रंप शी जिनपिंग से 6 साल में पहली बार आमने-सामने मिले थे। इस मीटिंग में ज्यादातर US-चीन ट्रेड टेंशन पर ही बात हुई। बता दें कि अमेरिका और चीन रेयर अर्थ मिनरल्स पर कंट्रोल के लिए मुकाबला कर रहे हैं।

ये ऐसे जरूरी मिनरल्स हैं जो स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक गाड़ियों से लेकर एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी और रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम तक सब कुछ सपोर्ट करते हैं। सालों से, चीन का इन पर एक तरह से एकाधिकार रहा है, जो दुनिया के 60-70% रेयर अर्थ एलिमेंट्स का प्रोडक्शन करता है और प्रोसेसिंग कैपेसिटी का इससे भी बड़ा हिस्सा कंट्रोल करता है।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे समय में की है जब रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर आमने-सामने है। ट्रंप चीन के साथ एक मुश्किल रास्ते पर चल रहे हैं, एक तरफ भारी टैरिफ की धमकियां दे रहे हैं और दूसरी तरफ दोस्ती के ऑफर दे रहे हैं। अपनी तीखी बातों के बावजूद, ट्रंप जिनपिंग के साथ बातचीत की मेज पर बैठने के लिए मजबूर हुए। इसका कारण सिर्फ डिप्लोमेसी नहीं है, बल्कि जरूरी मिनरल्स, मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन और ग्लोबल लॉजिस्टिक्स पर चीन की मजबूत पकड़ है।
चीन की रेयर अर्थ पर मोनोपॉली
कहानी रेयर अर्थ एलिमेंट्स से शुरू होती है जो मॉडर्न टेक्नोलॉजी के अनदेखे ड्राइवर हैं। कारों और मिसाइलों से लेकर स्मार्टफोन तक, इनमें से कोई भी इन मिनरल्स के बिना काम नहीं कर सकता। चीन दुनिया के लगभग 70% रेयर अर्थ प्रोडक्शन और लगभग 87% रिफाइनिंग कैपेसिटी को कंट्रोल करता है। जब ट्रंप ने AI चिप्स पर एक्सपोर्ट नियमों को सख्त किया, तो चीन ने रेयर अर्थ की सप्लाई को रोककर जवाब दिया, जिससे अमेरिकी इंडस्ट्रीज में घबराहट फैल गई।
लेकिन रेयर अर्थ तो बस शुरुआत है। 1980 के दशक में डेंग शियाओपिंग के स्ट्रेटेजिक प्लान के तहत, चीन का मकसद सिर्फ फैक्ट्रियां बनाना नहीं था बल्कि पूरी सप्लाई चेन पर कंट्रोल करना था। माइनिंग, रिफाइनिंग, प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट। बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी और विदेशों में अधिग्रहण के जरिए चीन ने वह बनाया जिसे अब एक्सपर्ट्स "क्रिटिकल मिनरल्स का OPEC" कहते हैं।
लिथियम, ग्रेफाइट और कोबाल्ट
रेयर अर्थ के अलावा चीन लिथियम, ग्रेफाइट और कोबाल्ट के प्रोडक्शन और रिफाइनिंग पर हावी है, जो EV बैटरी और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए बहुत जरूरी हैं।
- चीन दुनिया भर में सभी लिथियम का लगभग 58% रिफाइन करता है।
- यह दुनिया के 90% से ज्यादा नेचुरल ग्रेफाइट का प्रोडक्शन और प्रोसेसिंग करता है।
- इसकी कंपनियां डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में लगभग 80% कोबाल्ट माइनिंग को कंट्रोल करती हैं।
- ये मिनरल्स ग्रीन टेक्नोलॉजी के दौर का नया तेल हैं, जो चीन को क्लीन एनर्जी इकोनॉमी में एक जरूरी सप्लायर बनाते हैं।
चीन की छिपी हुई ताकत
चीन की ताकत सिर्फ कच्चे माल तक ही सीमित नहीं है। यह इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन की अनदेखी बीच की परतों तक फैली हुई है। ये वे इंटरमीडिएट केमिकल्स और कंपोनेंट्स हैं जिन्हें इंडस्ट्रीज आसानी से रिप्लेस नहीं कर सकतीं। सेमीकंडक्टर क्लीनिंग में इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोफ्लोरिक एसिड से लेकर फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) तक चीन दुनिया के लगभग 40% API मटीरियल का प्रोडक्शन करता है।
सोलर मैन्युफैक्चरिंग में, यह जरूरी बैकशीट ग्लास का 85% प्रोडक्शन करता है, और एडवांस्ड वायरिंग (जो डिफेंस और 5G में इस्तेमाल होती है) में, लगभग 60% फ्लोरोपॉलीमर केमिकल्स चीनी प्लांट से आते हैं। ये इंटरमीडिएट इनपुट चीन के छिपे हुए आर्थिक हथियार हैं, क्योंकि दूसरे देशों के लिए इन्हें कॉपी करना मुश्किल और महंगा है।
मैन्युफैक्चरिंग में बादशाहत कैसे बना मेड इन चाइना?
चीन की महारत कच्चे माल को तैयार प्रोडक्ट्स में बदलने में है। राज्य की सब्सिडी और सस्ते कोयले से मिलने वाली एनर्जी से सपोर्टेड इसकी "मेड इन चाइना" रणनीति ने देश को दुनिया की क्लीन-टेक फैक्ट्री बना दिया है।
2024 तक:
- चीन ने दुनिया की 76% लिथियम-आयन बैटरी बनाईं।
- EV एनोड्स के 97% और कैथोड्स के 90% को कंट्रोल किया।
- 236 GW से ज्यादा के सोलर पैनल एक्सपोर्ट किए जो लाखों घरों को बिजली देने के लिए काफी हैं।
इस दबदबे ने अमेरिका और यूरोप को अपने एनर्जी ट्रांजिशन के लिए चीनी ग्रीन टेक्नोलॉजी और कंपोनेंट्स पर बहुत ज्यादा निर्भर बना दिया है।
चीन के कंट्रोल में ग्लोबल लॉजिस्टिक्स
फैक्ट्रियों और खानों से परे, चीन ग्लोबल ट्रेड की मुख्य धमनियों को कंट्रोल करता है। यह दुनिया के 54% जहाज बनाता है और ग्लोबल शिपिंग फ्लीट के 36% को कंट्रोल करता है। 2024 में, चीनी बंदरगाहों ने दुनिया के कुल कंटेनर ट्रैफिक का एक-तिहाई हिस्सा संभाला जिसमें अकेले शंघाई बंदरगाह ने 50 मिलियन TEUs को प्रोसेस किया, जो दुनिया में सबसे ज्यादा वॉल्यूम है।
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए, चीन ने खुद को 70 से ज्यादा देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल कर लिया है। बंदरगाह, रेलवे, हाईवे और पाइपलाइन जो एशिया, अफ्रीका और यूरोप में फैली हुई हैं। यह नेटवर्क न केवल कच्चे माल तक पहुंच सुनिश्चित करता है, बल्कि पूरे महाद्वीपों में चीन के आर्थिक प्रभाव को भी दिखाता है।
ड्यूल-यूज और उभरती टेक्नोलॉजी
बीजिंग का लेटेस्ट पांच-साला प्लान ड्यूल-यूज टेक्नोलॉजी पर फोकस करता है जो कमर्शियल और मिलिट्री मकसद को मिलाती हैं- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ड्रोन, जेनेटिक रिसर्च और एडवांस्ड डिफेंस मटीरियल। इन्सपुर और SMIC जैसी चीनी कंपनियां अब दुनिया भर के AI सर्वर कंपोनेंट्स का 60% बनाती हैं, और DJI ड्रोन ग्लोबल मार्केट के 70% हिस्से पर कब्जा करते हैं।
यह देश जीनोमिक्स में भी आगे है, जिसमें BGI जीनोमिक्स दुनिया भर के जीन सीक्वेंसिंग इक्विपमेंट का 60% बनाती है। चीन की टेक्नोलॉजिकल लीडरशिप तेजी से डेटा, AI और बायोटेक के भविष्य के युद्धों में एक स्ट्रेटेजिक फायदा बन रही है।
इसे समझते हुए, प्रेसिडेंट ट्रंप सालों के टकराव के बाद अब एक डील करने के लिए तैयार हो गए। यह पार्टनरशिप कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, यह जरूरी लगती है क्योंकि मिनरल्स, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स पर चीन का इंटीग्रेटेड कंट्रोल इसे एक जरूरी ग्लोबल पार्टनर बनाता है।
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