नई दिल्ली। मोदी सरकार विनिवेश के तहत कई सरकारी कंपनियों को बेचने जा रही है। कुछ कंपनियों में विनिवेश के तहत कुछ हिस्सेदारी बेची जाएगी, लेकिन कुछ कंपनियां पूरी तरह से बेंच दी जाएंगी। निजी क्षेत्र की जो कंपनी इन सरकारी कंपनियों को खरीदेगी उसे इन सरकारी कंपनियों का पूरी तरह से नियंत्रण दिया जाएगा। इसके बाद ये सरकारी कंपनियां पूरी तरह से प्राइवेज कंपनियां बन जाएंगी। इन कंपनियों के कर्मचारी भी निजी क्षेत्र के माने जाएंगे। लेकिन अभी तक देखा गया है कि जिन सरकारी कंपनियों को निजी क्षेत्र को बेचा गया है, उनमें निवेश करने वालों का काफी फायदा हुआ है। इसका कारण यह रहता है कि कंपनियां निजी क्षेत्र में आते ही इनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
कौन सी सरकारी कंपनियां बिकने जा रहीं
मोदी सरकार बीपीसीएल में 53.4 फीसदी और शिपिंग कॉर्पोरेशन में 63.5 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। इसके अलावा कंटेनर कॉर्पोरेशन यानी कॉनकॉर में 30.9 प्रतिशत हिस्से के विनिवेश का निर्णय लिया गया है।
सरकार 2007 में मारुति से पूरी तरह निकल गई थी
देश में मारुति सुजुकी की शुरुआत 1982 में सरकार और जापान की सुजुकी के साथ ज्वाइंट वेंचर के रूप में हुई थी। उस वक्त सरकार की 74 फीसदी और सुजुकी की 26 फीसदी हिस्सेदारी थी। बाद में सुजुकी ने 2 बार में अतिरिक्त शेयर खरीदकर हिस्सेद कर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 50 फीसदी कर ली थी। बाद में 1992 में सरकार की शेयर होल्डिंग 50 फीसदी से नीचे आ गई। इसके बाद मारुति को निजी कंपनी घोषित कर दिया गया था। 2002 में सरकार ने मैनेजमेंट कंट्रोल भी निजी क्षेत्र को दे दिया था। इसके बाद 2007 में बची हुई हिस्सेदारी बेचकर सरकार इस कंपनी से पूरी तरह से बाहर हो गई थी।
जानिए मुनाफे का सफर
मारुति सुजुकी का आईपीओ जुलाई 2003 में 125 रुपए के भाव पर आया था। वहीं इस समय मारुति सुजुकी का शेयर करीब 7000 रुपये के ऊपर चल रहा है। इस प्रकार अगर देखा जाए तो बीते 16 साल में शेयर में 5600 फीसदी की तेजी आई है। आज मारुति सुजुकी देश की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी है।


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