नई दिल्ली, जुलाई 12। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापी जानी वाली देश की खुदरा मुद्रास्फीति जून में मामूली गिरावट के साथ 6.26 फीसदी पर आ गई। इससे पहले मई में यह 6.3 फीसदी रही थी। इस बात का खुलासा सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए आंकड़ों में हुआ है। यह लगातार दूसरी बार है जब सीपीआई डेटा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 6 फीसदी के ऊपरी मार्जिन से अधिक रहा है। इससे पहले लगातार पांच महीनों तक सीपीआई 6 फीसदी के नीचे रहा था।

क्यों अधिक रही खुदरा महंगाई
जून में ईंधन की बढ़ती कीमतों और खाद्य महंगाई के कारण खुदरा महंगाई दर काफी अधिक रही। खाद्य मुद्रास्फीति मई में 5.01 प्रतिशत रही, जो जून में बढ़ कर 5.15 प्रतिशत हो गई। सरकार ने केंद्रीय बैंक से मार्च 2026 को समाप्त होने वाली पांच साल की अवधि में खुदरा मुद्रास्फीति को 2 प्रतिशत के मार्जिन के साथ 4 प्रतिशत पर बनाए रखने के लिए कहा है। यानी अधिकतम 6 फीसदी और कम से कम 2 फीसदी।
औद्योगिक उत्पादन में तीखी उछाल
पिछले साल की तुलना में लो-बेस इफेक्ट के कारण मई में औद्योगिक उत्पादन में 29.3 फीसदी की जोरदार उछाल दर्ज की गयी। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) द्वारा मापी जाने वाले फैक्ट्री आउटपुट में पिछले साल की समान अवधि में 33.4 प्रतिशत की गिरावट आई थी, क्योंकि कोरोनवायरस के कारण लगे लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह रोक दिया था।
पिछले महीने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी खुदरा महंगाई
मई में उच्च खाद्य और ऊर्जा कीमतों के कारण बढ़कर रिटेल इंफ्लेशन यानी खुदरा महंगाई 6.3 प्रतिशत हो गई थी। वहीं कच्चे तेल और विनिर्मित (मैन्युफैक्चर्ड) वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति मई में 12.94 प्रतिशत के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई। इससे पहले मई 2020 में थोक महंगाई दर (-) 3.37 प्रतिशत रही थी।


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