नयी दिल्ली। कोरोनावायरस से बहुत सारे कारोबारी सेक्टर संकट में हैं। इससे रिलायंस इंडस्ट्रीज को भी झटका लगा है। मगर इस भारी संकट के बावजूद कंपनी का कर्ज कम होने की संभावना है। विश्लेषक कहते हैं कि भले ही ऊर्जा और खुदरा मांग छह महीने तक संघर्ष करे पहले से नियोजित संपत्ति की बिक्री में देरी हो फिर भी अरबपति कारोबारी मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के कर्ज में कमी आने की संभावना है। साथ ही रिलायंस फिर से निवेश को प्राथमिकता दे सकती है। कोरोना संकट के अलावा रिलायंस मजबूत होकर उभरी है क्योंकि इसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियों के सामने हाई लोन चुनौतियों और धीमे निवेश का सामना करना है।

रिलायंस के सामने चुनौतियां
मनीकंट्रोल में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोनावायरस विश्व स्तर पर अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहा है, जिससे रिलायंस को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें भारत और कई देशों में लॉकडाउन के नतीजे में वैश्विक तेल उत्पादों की मांग में गिरावट से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, इसके रिटेल सेक्टर के लिए फैशन / इलेक्ट्रॉनिक्स मांग में संभावित मंदी, टेलीकॉम निवेश का धीमा मुद्रीकरण और अभी भी उच्च कर्ज शामिल हैं। नतीजतन रिलायंस के शेयर में इस साल अब तक 21 फीसदी की गिरावट आई है, लेकिन अभी भी ये सेंसेक्स से 7 प्रतिशत कम है।
स्थिति नहीं है साफ
जानकारों के अनुसार मौजूदा स्थिति कब सामान्य होगी ये अभी साफ नहीं है। मौजूदा चुनौतियों से हर महीने रिलायंस के हर कारोबार की बिक्री पर नकारात्मक असर पड़ेगा। 2020-21 में रिलायंस का लोन स्थिर रह सकता है और इसमें बढ़ोतरी के संकेत नहीं है। इसके अलावा रिलायंस का लगभग आधा कर्ज और देनदारियां बड़े पैमाने पर डॉलर फंडेड हैं, जो डॉलर से जुड़े ऊर्जा कैशफ्लो के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं। रिलायंस कर्ज बढ़ा भी सकती है, क्योंकि इसकी देनदारियों को रिफाइनेंस करना या होगा। हाल ही में एक खबर आई थी कि जिसके तहत रिलायंस इंडस्ट्रीज 25000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है। कंपनी यह रकम लॉन्ग टर्म डेब्ट यानी लोन के जरिये जुटाएगी।


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