नयी दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था गिरावट जारी है। हालांकि जुलाई-सितंबर तिमाही जीडीपी में गिरावट की गति धीमी हो गई है। वित्त वर्ष 2020-21 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर -7.5 फीसदी रही, जो जून तिमाही में -23.9 फीसदी रही थी। जीडीपी में कम गिरावट को अच्छा माना जा रहा है। लेकिन अभी सावधानी बरतने की जरूरत है। सरकार पहले ही इस बात की पुष्टि कर चुकी है कि दूसरी तिमाही के आंकड़े इकोनॉमी में वी-आकार (पहले गिरावट और फिर रिकवरी) की रिकवरी की तरफ इशारा करते हैं। मगर क्या ये रिकवरी बरकरार रहेगी?

इन चार बातों पर करें गौर
पहली बात कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब दिसंबर 2017 के स्तर पर वापस आ गई है, जिसका अर्थ है कि इकोनॉमी लगभग तीन साल पहले के स्तर तक सिकुड़ गई है। दूसरे बेहतर तुलना पिछले वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही से करना होगा, जब अर्थव्यवस्था 4.4 फीसदी की दर से बढ़ रही थी। तीसरे इस साल जून और सितंबर की तिमाहियों के लिए जीडीपी के आंकड़े मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र में आर्थिक गतिविधि पर आधारित प्रारंभिक अनुमानों पर आधारित हैं। असंगठित क्षेत्र का डेटा इसमें नहीं है। इसलिए आंकड़ों में और गिरावट आ सकती है। चौथी बात कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने जीडीपी में दोहरे अंक (-15.7 फीसदी) की गिरावट दर्शाते हैं, जो भारत को मंदी की ओर धकेल रहे हैं।
आगे कैसे रहेंगे हालात
जानकार कहते हैं कि जीडीपी में सुधार का स्वागत है, मगर ये उछाल बढ़ा-चढ़ा कर बताई गई हो सकती है। असली तस्वीर डेटा में संशोधन के बाद में उभरेगी। त्योहारी सीजन के बावजूद डिस्क्रेशनरी उत्पादों की बिक्री में में गिरावट आई है। एक अनुमान के अनुसार 2020-21 में भारत की रियल जीडीपी में 10.5 फीसदी की गिरावट आ सकती है। खपत मांग और निवेश, अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी फैक्टर, में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है। इनमें सुधार की बहुत अधिक उम्मीद नहीं है।


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