Fighter Jet Deal: भारत अपनी वायु शक्ति (Air Power) को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। फ्रांस के साथ करीब ₹3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल F4 लड़ाकू विमान (Rafale F4 Fighter Jets) की संभावित मेगा डील (Mega Deal) सिर्फ एक रक्षा खरीद (Defence Purchase) नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक (Strategic), तकनीकी (Technological) और औद्योगिक क्षमता (Industrial Capability) को मजबूत करने वाला बड़ा निर्णय साबित हो सकती है। माना जा रहा है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) की भारत यात्रा के दौरान इस पर अंतिम मुहर लग सकती है।

यदि यह सौदा पूरा होता है तो भारत के पास कुल 176 राफेल विमान होंगे, जिससे वह फ्रांस के बाहर राफेल का सबसे बड़ा ऑपरेटर (Operator) बन जाएगा। यह कदम भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) की घटती स्क्वाड्रन संख्या (Squadron Strength) - स्वीकृत 42 के मुकाबले वर्तमान में करीब 29 - को संतुलित करने और चीन-पाकिस्तान की संयुक्त चुनौतियों का जवाब देने के लिहाज से बेहद अहम है।
तकनीक और मारक क्षमता-
इस डील के तहत वायुसेना को 88 सिंगल-सीट और 26 ट्विन-सीट राफेल F4 जेट मिलेंगे। F4 स्टैंडर्ड नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर में सक्षम है और भविष्य में इन्हें F5 स्टैंडर्ड तक अपग्रेड किया जा सकेगा। F5 अपग्रेड के बाद ये विमान 'लॉयल विंगमैन' जैसे उन्नत लड़ाकू ड्रोन्स के साथ मिलकर ऑपरेशन कर सकेंगे।
राफेल की 'ओमनीरोल' क्षमता इसे एक ही मिशन में एयर सुपीरियॉरिटी, ग्राउंड अटैक, रेक्की और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बनाती है। इसमें भारत-विशिष्ट सुधार, जैसे 'कोल्ड-स्टार्ट' क्षमता, इसे लेह जैसे ऊंचे और ठंडे इलाकों में भी तुरंत ऑपरेशन के लिए तैयार रखते हैं।
राफेल लंबी दूरी की मीटियोर एयर-टू-एयर मिसाइल, SCALP क्रूज मिसाइल, हैमर प्रिसिजन वेपन और स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम से लैस है। इसकी मारक क्षमता इतनी है कि यह दुश्मन के क्षेत्र में प्रवेश किए बिना ही सटीक हमले कर सकता है।
नागपुर बनेगा डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग हब-
इस सौदे की सबसे बड़ी खासियत इसका 'मेक इन इंडिया' मॉडल है। शुरुआती 18 विमान फ्रांस से तैयार अवस्था में आएंगे, जबकि बाकी 96 विमानों का निर्माण नागपुर में किया जाएगा। टाटा, महिंद्रा, डायनेमैटिक टेक्नोलॉजीज सहित 40 से अधिक भारतीय कंपनियां इसमें भाग लेंगी। स्वदेशी हिस्सेदारी 30% से शुरू होकर 60% तक पहुंचाने का लक्ष्य है। साथ ही डसॉल्ट और सफरान भारत में MRO (मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल) हब स्थापित करेंगे, जिससे भारत वैश्विक राफेल सर्विस सेंटर के रूप में उभर सकता है।
पहले से मजबूत हो रहा बेड़ा-
भारत पहले ही 36 राफेल विमानों को वायुसेना में शामिल कर चुका है। इसके अलावा नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन (M) जेट्स की लगभग ₹63,000 करोड़ की डील भी हो चुकी है, जिनकी तैनाती INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य पर होगी। इनकी डिलीवरी 2030 तक पूरी होने की उम्मीद है।
ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ताकत-
राफेल ने वास्तविक परिस्थितियों में भी अपनी क्षमता साबित की है। मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान इनकी तैनाती की गई थी, जहां SCALP जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों के उपयोग की चर्चा रही। लद्दाख क्षेत्र में भी रणनीतिक तैनाती के जरिए राफेल ने अपनी बहु-भूमिका क्षमता प्रदर्शित की।
आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम-
यह डील भारतीय वायुसेना की मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट योजना का हिस्सा है। जहां एक ओर भारत तेजस Mk-2 और पांचवीं पीढ़ी के AMCA जैसे स्वदेशी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, वहीं राफेल F4 निकट भविष्य में हवाई सुरक्षा की रीढ़ बनेगा।
कुल मिलाकर, यह सौदा केवल आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद नहीं, बल्कि भारत की सामरिक शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक रक्षा साझेदारी का प्रतीक है। यदि यह डील अंतिम रूप लेती है, तो भारत न सिर्फ अपनी सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी नई पहचान स्थापित करेगा।


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