महंगाई सिर्फ सुर्खियों से हुई गायब या आम लोगों के जीवन पर भी कम हुआ असर?

Inflation in India: भारत की हेडलाइंस महंगाई महामारी के बाद पहली बार RBI के 2.0-6.0% के टारगेट बैंड से नीचे आ गई और 1.6% सालाना पर पहुंच गई, जो कई सालों का निचला स्तर है और RBI के 4.0% के औसत महंगाई लक्ष्य से नीचे लगातार छठी रीडिंग है। जुलाई 2025 में भारत की महंगाई दर में तेज गिरावट दर्ज की गई, जो हाल के वर्षों में सबसे निचले स्तरों में से एक है।

Inflation in India

खुदरा महंगाई में आई कमी

कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) खुदरा महंगाई आधारित सालाना आधार पर घटकर 1.55% पर आ गई, जो जून 2017 के बाद का सबसे निचला स्तर है और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2-6% के लक्ष्य दायरे से भी नीचे है। इस गिरावट का मुख्य कारण खाने-पीने के दामों में तेज कमी रही, जहां खाद्य महंगाई -1.76% पर रही, यानी जुलाई 2024 की तुलना में औसतन फूड सस्ते हो गए। ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई दर 1.18% और शहरी क्षेत्रों में 2.05% रही, दोनों में ही हल्का ही रुझान दिखा।

थोक महंगाई में गिरावट

थोक स्तर पर भी होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में -0.58% की गिरावट दर्ज की गई, जो थोक स्तर पर महंगाई में कमी को दिखाती है। थोक खाद्य महंगाई तो और गहराई में जाकर -2.15% पर पहुंच गई, जिसमें सब्जियों, दालों, फ्यूल और कच्चे माल के दामों में कमी का कंट्रीब्यूशन रहा।

पिछले 8 सालों में सबसे कम महंगाई?

भारत में 2025 की खुदरा महंगाई (CPI) पिछले दस वर्षों की तुलना में काफी कम स्तर पर पहुंच गई है। जनवरी 2025 में यह लगभग 4.3% थी, लेकिन लगातार सात महीने गिरते हुए जुलाई 2025 में केवल 1.55% पर आ गई, जो जून 2017 के बाद का सबसे निचला स्तर है। इसकी तुलना करें तो 2024 में औसतन लगभग 4.9% महंगाई रही थी, 2023 में करीब 5.6% और 2022 में यह 6.7% तक पहुंच गई थी। यानी 2025 का औसत अब तक लगभग 2-2.5% के बीच रहा है, जो पिछले तीन वर्षों की तुलना में 3 से 5 प्रतिशत अंक कम है।

कौन-सी महंगाई (Inflation) कम हुई?

खाद्य महंगाई (Food Inflation): सब्जियों, अनाज और दालों की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है।

कौन-सी महंगाई अभी उतनी नहीं गिरी?

कोर महंगाई (Core Inflation - Fuel, Housing, Services)- यह स्थिर रही है, बड़ी गिरावट सिर्फ खाने-पीने की वजह से दिख रही है।

पिछले 10 साल में महंगाई

Inflation in India

2025 में महंगााई

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महंगाई में गिरावट पर इकोनॉमिस्ट की राय?

इकोनॉमिस्ट का मानना है कि यह गिरावट कंज्यूमर को राहत देती है और मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव की संभावना खोलती है, लेकिन यह अस्थायी भी हो सकती है, क्योंकि मौसमी कारण और वैश्विक दामों के रुझान आने वाले महीनों में महंगाई को फिर बढ़ा सकते हैं। कुल मिलाकर, जुलाई के आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था में एक असामान्य रूप से कम महंगाई वाले दौर की ओर इशारा करते हैं, जो मुख्य रूप से खाद्य दामों में नरमी और अनुकूल आधार प्रभाव के कारण है।

विशेषज्ञ इस गिरावट को मौद्रिक सहजता के लिए संभावित हरी झंडी के रूप में देखते हैं, हालांकि कुछ लोग चेतावनी देते हैं कि यह गिरावट अस्थायी हो सकती है, और Inflation 2026 की शुरुआत में फिर से बढ़ सकती है।

महामारी के बाद यह पहली बार है कि महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2-6% के लक्ष्य सीमा से नीचे आ गई है, जो असामान्य रूप से कम कीमत का दबाव का संकेत है

टैरिफ मुद्दे का भारत में कच्चे तेल की कीमत पर कुछ असर पड़ सकता है।

अमेरिका में महंगाई की मार

जुलाई 2025 में अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की वार्षिक बढ़ोतरी रेट 2.7% रही, जिससे जून की दर (भी 2.7%) के बराबर बनी रही। प्रमुख Inflation माप-कोर CPI की वार्षिक वृद्धि 3.1% रही। The Wall Street Journal- थोक स्तर पर (PPI), जुलाई में महंगाई मासिक आधार पर 0.9% बढ़ी, यह तीन साल में सबसे तेज़ बढ़ोतरी थी, और वार्षिक दर लगभग 3.3% रही

इन आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई 2025 में भारत उपभोक्ताओं को राहत देने वाली स्थिति में था, जबकि अमेरिका में कीमतें अभी भी दबाव में थीं और थोक स्तर पर महंगाई बढ़ते संकेत दे रही थी।

आम लोगों की नजर से भारत में महंगाई

भारत में जुलाई 2025 की इतनी कम महंगाई (1.55% CPI) का असर आम लोगों को महसूस हो सकता है। लेकिन यह असर हर व्यक्ति और हर क्षेत्र के लिए समान नहीं होगा।

भारत में महंगाई केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे आम जनता के जीवन को प्रभावित करती है। जब भी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सबसे पहले मीडिल क्लास और लोअर क्लास परिवारों पर दिखाई देता है।

उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के गुंजेश, जो एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। बताते हैं कि पिछले एक साल में उनके घर का किराना खर्च लगभग 20% बढ़ गया है। पहले जो सब्जियां 30-40 रुपये किलो मिलती थीं, अब वही 60-70 रुपये किलो तक पहुंच चुकी हैं। दालों और खाने के तेल की कीमतों ने भी उनके बजट को बिगाड़ दिया है।

झारखंड की हाउसवाइफ पिंकी सिंह कहती हैं कि पहले वह हफ्ते में 2-3 बार बाहर खाना ऑर्डर कर लिया करती थीं, लेकिन अब बढ़ती कीमतों के कारण उन्होंने यह आदत लगभग छोड़ दी है। उनके अनुसार, जहां पहले 1,000 रुपये में पूरे हफ्ते का सब्जी और फल आ जाता था, अब वही मुश्किल से चार दिन तक चलती है।

गांवों में भी स्थिति आसान नहीं है। बिहार के किसान विजय सिंह बताते हैं कि खाद और डीजल की बढ़ती कीमतों ने उनकी खेती की लागत बढ़ा दी है। जबकि अनाज का सपोर्ट प्राइस उतना नहीं बढ़ा, जिससे किसानों का मुनाफा घट रहा है।

आम लोगों की नजर से देखा जाए तो महंगाई केवल पैसे की कमी नहीं लाती, बल्कि उनकी जीवनशैली में बदलाव करने पर मजबूर करती है। लोग अब गैर-जरूरी खर्चों को काट रहे हैं, बाहर घूमने-खाने की आदतें घटा रहे हैं और सस्ते विकल्प ढूंढ़ रहे हैं।

यह साफ है कि महंगाई की असली तस्वीर केवल सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि हर घर के बजट और आम लोगों की दैनिक जिंदगी में दिखाई देती है।

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