नयी दिल्ली। कोरोनावायरस का देश की अर्थव्यवस्था पर काफी निगेटिव असर पड़ा है। वहीं इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से बेरोजगारी काफी बढ़ी है। लॉकडाउन अवधि के दौरान अब तक 24 मार्च से भारत में बेरोजगारी दर 20 फीसदी से ऊपर रही है। कंपनियों की तरफ से कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने की खबर लगातार आ रही हैं। सीएमआईई (Centre for Monitoring Indian Economy) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 24 मई को खत्म हुए हफ्ते में बेरोजगारी दर 24.3 फीसदी रही। यह दर्शाता है कि 20 अप्रैल से लॉकडाउन में ढील के बावजूद बेरोजगारी दर पर अब तक कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।

शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी अधिक
17 मई को समाप्त सप्ताह के दौरान शहरी बेरोजगारी दर लगभग 27 फीसदी थी। ये ग्रामीण बेरोजगारी दर से अधिक है। यह लॉकडाउन की वजह से आए नौकरी संकट को बखूबी दर्शाता है। कंपनियां आक्रामक रूप से कर्मचारियों की छंटनी करने के साथ ही सैलेरी में भी कटौती कर रही हैं। बढ़ते घाटे को दूर करने के लिए हाल ही में प्रमुख टैक्सटाइल कंपनी रेमंड ने सैकड़ों कर्मचारियों को निकाल दिया। इससे पहले ओला, उबेर, जोमैटो और स्विगी जैसे स्टार्टअप्स कर्मचारियों की छंटनी और वेतन में कटौती कर चुके हैं।
ओला, स्विगी में सैकड़ों बेरोजगार
ओला के 1100 और स्विगी में काम करने वाले 1400 लोग बेरोजगार हो गए हैं। इन कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी के लिए इनकम में गिरावट का हवाला दिया। वहीं जोमैटो ने तो 13 फीसदी वर्कफोर्स को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस सबके पीछे मुख्य कारण कोरोनावायरस और लॉकडाउन है। महामारी का प्रभाव ऐसा है कि विशेषज्ञों का मानना है कि 2020-21 की तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में मंदी की संभावना है।
ग्रामीण इलाकों में भी हालात खराब
ग्रामीण अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे खुलने के बावजूद पिछले कुछ हफ्तों से ग्रामीण बेरोजगारी दर बढ़ रही है। 25.09 फीसदी बेरोजगारी का मतलब है कि ग्रामीण भारत में हर चार श्रमिकों (Working Age) में से एक बेरोजगार है। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 24.3 फीसदी है यानी पूरे भारत की कामगार श्रेणी में हर 4 में से एक व्यक्ति के पास काम नहीं है। लाखों कामगार मजदूर गांवों में वापस पहुंच रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब हो सकते हैं।


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