Cipla : देश के इतिहास का 88 वर्ष पुराना टुकड़ा अब यादों में शामिल होने जा रहा है। देश में बहुत कम ही कंपनियां है जो भारत की आशाओं और संघर्षों के साथ इतने जुड़े हुए हैं। उन कंपनियों में से एक नाम सिप्ला का है। सिप्ला राजस्व के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी दवा बनाने वाली कंपनी हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्राइवेट इक्विटी फर्म ब्लैकस्टोन अगले सप्ताह सिप्ला की हिस्सेदारी खरीदने के लिए नॉन-बाइंडिंग बिड दाखिल करने वाली है। यह बोली 33 प्रतिशत के लिए लगेगी। इसके साथ ही सिप्ला से हामिद परिवार के बाहर निकलने की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो जाएगी।

वर्ष 1972 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सिप्ला के मालिक यूसुफ ख्वाजा हमीद से एक संदेश मिला इस संदेश में लिखा था कि मैडम यह दवाई है क्या कई भारतीयों को लाइफ सेवर दवाई के इस्तेमाल के लिए सिर्फ इसलिए वंचित कर देना चाहिए क्योंकि आविष्कारक करने वाले को हमारे चहरे का रंग पसंद नही हैं। यह संदेश सुन कर वह अचंभित रह गई।
हामिद जो पेटेंट कानूनों के खिलाफ लड़ रहे थे। उन्होंने प्रोप्रानोलाल नामक एक दवा का विपणन किया था। प्रोप्रानोलाल जो एक ह्रदय रोग के खिलाफ एक दवा थी, जो देश में पहला बीटा ब्लॉकर था।
इस दवा का आविष्कार इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज (आईसीआई) ने 1963 में इंग्लैंड में किया गया था और इसको वर्ष 1965 में दुनिया भर में विपणन किया गया था। देश में सिप्ला ने वर्ष 1972 में प्रोप्रानोलोल का सामान्य संस्करण पेश किया था और आईसीआई ने सिप्ला के खिलाफ पेटेंट उल्लंघन के लिए मामला दायर किया था।
गांधी को हामिद का संदेश पसंद आया और देश में रातों-रात अपना पेटेंट कानून बदल दिया। नए कानून में यह कहा गया कि अंतिम प्रोडक्ट पर कोई भी कंपनी पेटेंट नहीं करा सकती। बल्कि सिर्फ उत्पाद को बनाने की प्रोसेस का पेटेंट करा सकती है और वह भी 7 वर्ष की अवधि के लिए के सकती है।
अब हामिद मैन्युफैक्चरिंग विनिर्माण प्रोसेस में थोड़ा चार्ज करके अपना कॉपी कैट संस्करण, जिसे जेनेरिक कहा जाता है, बना सकते थे और वह कानून को भी नहीं तोड़ रहे थे।
देश के राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया के रूप में सिप्ला ने शुरुआत की थी। जब यूसुफ के वैज्ञानिक उद्योगपति पिता ख्वाजा अब्दुल हमीद जिन्होंने जर्मनी में रसायन विज्ञान का किया था। उन्होंने वर्ष 1935 में सिप्ला की स्थापना की थी।
देश को सिप्ला के रूप में आधुनिक फार्मा कंपनी मिली थी जो भारतीयों को दवा सप्लाई करती थी। यह एक स्वदेशी प्रोजेक्ट था। जिसको दशकों बाद ख्वाजा अब्दुल हामिद के बेटे मल्टीनेशनल दवा कंपनियों के खिलाफ एक बैटल मशीन में बदल दिया।
सिप्ला ने अपने शुरुआती वर्ष में बेहतर प्रदर्शन नहीं किया। ख्वाजा अब्दुल हामिद ने इसे बंद करने का विचार किया। मगर दूसरे विश्व युद्ध ने किस्मत बदल दी। जब दवाएं दुर्लभ हो गई। इसके बाद सिप्ला को बड़े ऑर्डर मिले और सिप्ला को फिर से पटरी पर ला दिया।
बिग फार्मा कंपनी के खिलाफ यूसुफ हमीद का अभियान उनके पिता ख्वाजा अब्दुल हामिद से प्रेरित था। वर्ष 1972 में उनके पिता के गुजर जाने के बाद उन्होंने पदभार संभाला।


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