नई दिल्ली। भारत के कठोर कदम से चीन फिर तिलमिला गया है। दरअसल बीते शनिवार को भारत ने देश में आने वाले विदेशी निवेश के नियम में बदलाव कर दिया है। इन बदलावाें के तहत अब भारत में उन देशों के लोग या कंपनियां सीधा निवेश नहीं कर पाएंगे, जिनकी सीमाएं भारत से लगी हुई हैं। चीन की सीमा भारत से लगती है। दरअसल चीन कोनोना महामारी की आड़ में दुनिया के कई देशों में अपना निवेश बढ़ा रहा है। हाल ही में खबर आई काी कि भारत सबसे बड़ हाउंसिल लोन देने वाले एचडीएफसी में चीन की रिजर्व बैंक ने अपनी किस्सेदारी कोरोना महामारी के दौरान बढ़ाकर 1 फीसदी से ज्यादा कर ली है। इसके बाद भारत सरकार चौकन्नी हो गई। खबर आने के 24 घंटे के अंदर ही भारत ने विदेशी निवेश से जुड़ा हुआ फरमान जारी कर चीन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। दरअसल चीन कोरोना महामारी के दौर शेयर बाजार में आई गिरावट का फायदा उठाकर सस्ते में बड़ी कंपनियों के शेयर खरीदकर उनको हड़पने की साजिश कर रहा था। कई देशों में वह ऐसा प्रयास कर चुका है। लेकिन भारत ने 24 घंटे के अंदर ही चीन की चाल को फेल कर दिया है। इसके बाद चीन अपनी आदत के अनुसार अब भारत के खिलाफ आग उगल रहा है।
कई देश पहले ही कर चुके हैं ऐसा
जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया,स्पेन, इटली ऐसा ही कदम पहले ही उठा चुके हैं। कोरोना महामारी के बाद बनी स्थितियों की वजह से ये कदम उठाए गए हैं। सरकार के इस कदम का लक्ष्य वैल्यूएशन में गिरावट का फायदा उठाने वाले लोगों या देशों पर सख्ती करना है।
चीन ने आखिर क्या कहा
पड़ोसी देशों से एफडीआई नियमों में बदलाव पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। भारत में चीन के राजदूत ने इन बदलावों को डब्लटीओ नियमों के खिलाफ बताया है। चीन की तरफ से कहा गया है कि चीन ने भारत में बहुत बड़ा निवेश किया है। भारत में चीन ने 8 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। चीन के निवेश से भारत में बहुत सारे जॉब क्रिएट हुए हैं। चीन का कहना है कि हाल ही में किए गए निवेश का कोई गलत उद्देश्य नहीं है। भारत की तरफ से चीन के निवेश को रोकने के लिए उठाया गया कदम उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ है। चीन अभी सिर्फ भारत सरकार को एक चिट्ठी लिख कर अपनी आपत्ति जताई है। हो सकता है कि चीन इस मामले को डब्लूटीओ तक भी ले जाए।
ये है भारत का नया आदेश
चीन से आने वाले विदेशी निवेश पर सरकार ने सख्ती कर दी है। सरकार ने आदेश जारी करते हुए कहा है कि जिन-जिन देशों से भारत की सीमा लगती है, वहां से होने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट को पहले सरकार से मंजूरी लेनी होगी। अब तक ये इन्वेस्टमेंट ऑटोमेटिक रूट से हो जाते थे। अब चीन समेत सभी पड़ोसी देशों से एफडीआई पर मंजूरी लेनी जरूरी होगी। इसके अलावा मैनेजमेंट कंट्रोल पर असर पड़ने वाले एफडीआई पर भी मंजूरी जरूरी होगी।
ये है पूरा मामला
सेबी अभी चीन और भारत के दूसरे पड़ोसी देशों से आने वाले एफपीआई निवेश की जांच कर रहा है। कुछ दिनों पहले ही मार्केट रेगुलेटर ने कस्टोडियन को भेजे अपने संदेश में लिखा था कि जिन एफपीआई का बेनिफिशयरी अकाउंट चीन और हॉन्गकॉन्ग के हैं, उनकी जानकारी तुरंत मुहैया कराई जाए। इस पूरे मामले की शुरुआत एचडीएफसी में चीन के निवेश के साथ हुई थी। 13 अप्रैल को एचडीएफसी ने कहा था कि चीन के पीपल्स बैंक ने मार्च तिमाही में कंपनी में अपनी हिस्सेदारी 0.8 फीसदी से बढ़ाकर 1.01 फीसदी कर ली है। पीपल्स बैंक ने यह हिस्सेदारी ओपन मार्केट से खरीदी है। ऐसे में कई लोग इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि एफपीआई रूट के जरिए ओपन मार्केट से स्टेक खरीदना अधिग्रहण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।
भारत में चीन के 16 एफपीआई रजिस्टर्ड
भारत में अभी 16 चाइनीज एफपीआई रजिस्टर्ड हैं। इनका टॉप-टीयर शेयरों में 1.1 अरब डॉलर का निवेश है। चीन से डायरेक्ट और इनडायरेक्ट तरीके से भारतीय शेयर बाजार में कितना पैसा लगा है, अभी इसकी जानकारी नहीं है। सेबी और डिपॉजिटर्स ने अभी सिर्फ टॉप 10 ज्यूरिशडिक्शन का खुलासा किया है, जिसमें चीन नहीं आता है। एसेट मैनेजर्स का कहना है कि चीन से होने वाले निवेश को ट्रैक करना काफी मुश्किल है। यहां से आने वाला निवेश या तो बहुत छोटा है या फिर वो इंडियन एसेट मैनेजर्स के जरिए निवेश नहीं करते हैं, जिस कारण इसे जानना कठिन हो जाता है।


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