Census 2027: देश में 2021 में होने वाली बहुप्रतीक्षित जनगणना को लेकर अब बड़ी खबर सामने आई है। कोविड-19 के चलते 2021 में नहीं पाई जनगणना अब 2027 में होने वाली है। 5 साल देरी से होने वाली यह जनगणना में एक ऐतिहासिक बदलाव लाएगी। यह पहली बार होगा कि देश में जनगणना पूरी तरह से डिजिटल माध्यम से संपन्न होगी। इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंगलवार, 9 दिसंबर को लोकसभा में एक लिखित जवाब में इसकी पुष्टि की। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि डेटा संग्रह के लिए मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग किया जाएगा।
इस बड़े कदम के साथ भारत अब अमेरिका, ब्रिटेन, घाना और केन्या जैसे देशों की कतार में शामिल हो जाएगा, जहां पहले ही डिजिटल या हाइब्रिड जनगणनाएं सफलतापूर्वक आयोजित की जा चुकी हैं। हालांकि, 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए यह महत्वाकांक्षी प्रयास चुनौतियों से भी भरा रहने वाल है।
ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह डिजिटल जनगणना क्या है, यह कैसे होगा, और सबसे बड़ी बात कि इसके क्या फायदे और नुकसान हैं? साथ में डिजिटल जनगणना को लेकर क्या चिंताएं हैं... तो चलिए डिटेल में समझते हैं..ॉ
जनगणना क्या है और आखिरी बार कब हुआ था?
भारत में जनगणना हर दशक यानी 10 साल में एक बार होती है, जिसका उद्देश्य देश के जनसांख्यिकीय, सामाजिक, आर्थिक और अब जाति-आधारित डेटा को एकत्र करना है। पहली गैर-समकालीन जनगणना 1872 में हुई थी, जबकि स्वतंत्र भारत में पहली जनगणना 1951 में संपन्न हुई थी। आखिरी पूर्ण जनगणना 2011 में हुई थी, जिसके बाद 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण टल गई।

महामारी से उत्पन्न देरी के बाद, विभिन्न चुनावों, प्रशासनिक प्रक्रियागत विलंबों और प्रशासनिक सीमाओं को 'फ्रीज' करने की समय-सीमा में विस्तार के कारण जनगणना अब 2027 तक खिसक गई है। 2027 की यह जनगणना भारत की 16वीं जनगणना होगी, जिसे दो मुख्य चरणों में पूरा किया जाएगा।
पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक 'घर सूचीकरण और हाउस मैपिंग' का होगा। इसके बाद दूसरा चरण होगा 'जनसंख्या गणना', जो फरवरी-मार्च 2027 में संपन्न होगी। जिन क्षेत्रों में बर्फबारी होती है, उनके लिए विशेष प्रावधान किए जाएंगे, ताकि गणना प्रक्रिया बाधित न हो, चाहे भौगोलिक परिस्थितियां कैसी भी हों।
2027 की जनगणना में नया क्या है?
इस जनगणना के कुछ नए और महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहली बार यह पूरी तरह से डिजिटल होगी, जहां पारंपरिक कागजी फॉर्मों के बजाय, गणनाकर्मी अपने स्मार्टफोन (एंड्रॉइड/आईओएस) पर विशेष ऐप का उपयोग करके डेटा एकत्र करेंगे। इसके अलावा, नागरिक एक वेब पोर्टल के माध्यम से स्वयं-गणना (सेल्फ-इनुमरेशन) भी कर सकेंगे, जिससे प्रक्रिया में उनकी सीधी भागीदारी सुनिश्चित होगी।
इस जनगणना में 'जाति गणना' भी शामिल होगी, जहां स्वतंत्र भारत में पहली बार अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के अलावा अन्य जातियों का विस्तृत डेटा एकत्र किया जाएगा। भारत में आखिरी पूर्ण जाति गणना 1931 में हुई थी। ऐप 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, जिससे भाषाई समावेशिता सुनिश्चित होगी।
कनेक्टिविटी की समस्याओं वाले दूरदराज के क्षेत्रों के लिए एक हाइब्रिड फॉर्मेट का भी प्रावधान है, जहां कागजी फॉर्म का बैकअप उपलब्ध होगा। इस व्यापक डेटा का उपयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, आरक्षण नीतियों के निर्धारण, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण जैसी महत्वपूर्ण नीतियों के आधार के रूप में किया जाएगा।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया, "यह निर्णय लिया गया है कि जनगणना 2027 डिजिटल माध्यम से की जाएगी। डेटा मोबाइल ऐप के जरिए एकत्र किया जाएगा और जनता वेब पोर्टल के माध्यम से भी स्वयं-जनगणना कर सकेंगी।" यह स्पष्ट करता है कि सरकार प्रक्रिया को तकनीक-आधारित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने आगे कहा कि जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति की जानकारी उस स्थान पर जुटाई जाएगी, जहां वे गणना अवधि के दौरान पाए जाते हैं। इसके साथ ही, व्यापक प्रश्नावली में जन्म स्थान, अंतिम निवास, मौजूदा स्थान पर रहने की अवधि और प्रवास के कारण से संबंधित विस्तृत प्रश्न भी शामिल होंगे। सरकार फील्ड वर्क शुरू होने से पहले इस प्रश्नावली को आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित करेगी।
डिजिटल जनगणना के संभावित फायदे
डिजिटल जनगणना के कई संभावित फायदे हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है तेज और अधिक सटीक डेटा संग्रह की उम्मीद। डिजिटल तरीके भारत को दशकों से कागज-आधारित प्रक्रिया को धीमा और त्रुटिपूर्ण बनाने वाली बड़ी समस्याओं से निपटने में मदद कर सकते हैं। यह प्रक्रिया डेटा को और अधिक कुशल बनाएगी।
माना जा रहा है कि डिजिटल माध्यम से प्रारंभिक आंकड़े मात्र 10 दिनों में उपलब्ध हो जाएंगे, जबकि अंतिम आंकड़े 6-9 महीनों के भीतर जारी किए जा सकेंगे। यह 2011 की जनगणना के बिलकुल विपरीत है, जिसके अंतिम आंकड़ों को पूरी तरह से संकलित और प्रकाशित होने में कई साल लग गए थे।
तेजी से उपलब्ध डेटा का सीधा उपयोग 2029 के संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, विभिन्न सरकारी योजनाओं, फंड आवंटन और जनकल्याण कार्यक्रमों की अधिक सटीक योजना बनाने में किया जा सकेगा। जियो-टैगिंग, ऐप के भीतर सत्यापन सुविधाएं और स्वयं-गणना की सुविधा से ग्रामीण इलाकों, प्रवासी आबादी और कागजी प्रक्रिया में होने वाली 'अंडर-काउंटिंग' में महत्वपूर्ण कमी आने की उम्मीद है।
डिजिटल जनगणना से लागत में भी कमी आने की संभावना है। सरकार को लाखों टैबलेट खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि गणनाकर्मी अपने स्वयं के स्मार्टफोन का उपयोग करेंगे। इस पूरी प्रक्रिया के लिए कुल ₹14,618 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया है और आशा है कि इससे लगभग 2.4 करोड़ मानव-दिवस का अस्थायी रोजगार भी सृजित होगा, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को लाभ पहुंचाएगा।
डिजिटल जनगणना के संभावित जोखिम और चिंताएं
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी परियोजना में जोखिम भी कम नहीं हैं। पहली बड़ी चुनौती 'डिजिटल डिवाइड' है। देश की लगभग 65% आबादी ऑनलाइन है, लेकिन पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की गति और उपलब्धता अभी भी सीमित है, जो एक बड़ी बाधा बन सकती है। इससे सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के जनगणना से छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है।
दूसरी चुनौती 'डिजिटल साक्षरता की कमी' है। जनगणना के लिए तैनात किए जाने वाले तीन मिलियन से अधिक शिक्षक-आधारित गणनाकर्मियों को नई तकनीक पर गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त, बुजुर्गों, महिलाओं और प्रवासी मजदूरों में ऐप-आधारित बातचीत के प्रति संकोच और अनिच्छा देखी जा सकती है, जिससे डेटा संग्रह की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
तीसरी चिंता 'साइबर सुरक्षा और गोपनीयता' से जुड़ी है। जाति, प्रवास इतिहास और अन्य व्यक्तिगत सूचनाएं, यदि निजी स्मार्टफोन पर स्टोर होकर मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से भेजी जाएंगी, तो डेटा लीक और साइबर हमलों का जोखिम बना रहेगा। सरकार को डेटा एन्क्रिप्शन और सुरक्षित सर्वर आर्किटेक्चर पर विशेष ध्यान देना होगा ताकि नागरिकों की जानकारी गोपनीय रहे।
अफ्रीकी देशों का अनुभव भी भारत के लिए एक चेतावनी है। घाना, नाइजीरिया और केन्या जैसे देशों में डिजिटल जनगणनाओं के दौरान नेटवर्क बाधाएं, डेटा अपलोड की समस्याएं, उच्च त्रुटि दर और यहां तक कि जनता का प्रतिरोध भी देखने को मिला था। भारत को इन अनुभवों से सीख लेकर अपनी चुनौतियों का समाधान खोजना होगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिजिटल जनगणना 'भविष्य की ओर एक कदम' है, लेकिन यह 'जोखिम भरा प्रयोग' भी हो सकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी तक पहुंच, डेटा की गोपनीयता और साइबर सुरक्षा के मजबूत इंतजाम हों। ऑफलाइन डेटा सिंक और रीयल-टाइम सपोर्ट जैसी सुविधाओं से कई चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।
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