Cab Aggregators App: सरकार कैब एग्रीगेटर ऐप्स से जुड़े GST नियमों को स्पष्ट करने की तैयारी कर रही है। CNBC-TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने जानकारी दी है कि कमीशन बेस्ड और SaaS (सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस) मॉडल जैसे अलग-अलग बिजनेस मॉडल की वजह से टैक्स नियमों में समानता नहीं है, जिससे कंफ्यूजन की स्थिति बनी हुई है।

सरकार नए दिशानिर्देश लाने की कर रही है तैयारी
इस असमानता को दूर करने के लिए सरकार नए दिशानिर्देश लाने पर विचार कर रही है, ताकि इन कंपनियों पर GST लागू करने को लेकर कोई कंफ्यूजन न रहे और टैक्स कलेक्शन भी ट्रांसपरेंट तरीके से हो सके। सेंट्रल बोर्ड ऑफ इंडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स (CBIC) इस मामले में उद्योग से मिले सुझावों की जांच कर रहा है और जल्द ही यह मुद्दा जीएसटी काउंसिल के सामने रखे जाने की संभावना है।
सीएनबीसी रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक हाई कोर्ट ने CBIC को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में संबंधित स्टेकहोल्डर्स से बातचीत करें और उनके सुझावों के आधार पर आगे की सिफारिशें पेश करे। सरकार की कोशिश है कि अलग-अलग बिजनेस मॉडल के चलते टैक्स नियमों में जो असमानता दिख रही है, उसे दूर किया जा सके और कैब एग्रीगेटर ऐप्स के लिए स्पष्ट और एकरूप जीएसटी नीति बनाई जा सके।
कमीशन मॉडल और SaaS मॉडल में फर्क
कमीशन मॉडल में ओला और उबर जैसे ऐप्स इस मॉडल में काम करते हैं। ये हर राइड पर या तो 5% जीएसटी (बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट के) या 12% जीएसटी (इनपुट टैक्स क्रेडिट के साथ) वसूलते हैं। यह टैक्स सीधे यात्री से लिया जाता है और सरकार को एप की ओर से जमा किया जाता है।
SaaS (Software-as-a-Service) मॉडल में Namma Yatri और Rapido जैसे ऐप्स इस मॉडल को अपनाते हैं। इसमें प्लेटफॉर्म ड्राइवर से रोज़ाना या मासिक सब्सक्रिप्शन फीस वसूलते हैं, जिस पर 18% जीएसटी लगाया जाता है। हालांकि, यात्रियों से राइड के लिए कोई जीएसटी नहीं वसूला जाता। यही अंतर टैक्स नियमों में असमानता का कारण बन रहा है, जिसे सरकार अब स्पष्ट करना चाहती है।
एक्ट में दी गई ये जानकारी
CGST Act की धारा 9(5) है, जिसके तहत कुछ खास सर्विसेस जैसे कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर टैक्स की जिम्मेदारी सर्विस प्रोवाइडर (जैसे ड्राइवर) की बजाय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की होती है। यानी टैक्स ड्राइवर नहीं, बल्कि उबर या ओला जैसे ऐप्स को देना होता है।
लेकिन समस्या तब आती है जब बात SaaS मॉडल की होती है। Namma Yatri और Myn (Multiverse Technologies) जैसे प्लेटफॉर्म यह दावा करते हैं कि वे सिर्फ एक डिजिटल मंच (प्लेटफॉर्म) मुहैया कराते हैं, जो ड्राइवर और यात्री को आपस में जोड़ता है खुद कोई सेवा नहीं देते।
इसी आधार पर कर्नाटक अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (AAR) ने यह निर्णय दिया कि Namma Yatri और Myn को धारा 9(5) के दायरे में नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे सिर्फ सॉफ्टवेयर सेवा (SaaS) दे रहे हैं। दूसरी ओर, Uber और Rapido जैसे ऐप्स सिर्फ तकनीकी मंच नहीं हैं, बल्कि वे राइड की बुकिंग, भुगतान, ग्राहक सेवा और शिकायत समाधान जैसी सेवाओं में भी सीधा हस्तक्षेप करते हैं। इसलिए इन्हें धारा 9(5) के तहत टैक्स चुकाना पड़ता है।
इन कारणों के चलते ही सरकार को नए दिशानिर्देश तय करने के लिए मजबूर कर रहा है, ताकि यह तय हो सके कि कौन सा मॉडल टैक्स के दायरे में आता है और कौन नहीं।
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