US Fed Policy: अमेरिकी Federal Reserve ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन इससे भारतीय शेयर बाजार को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार के लिए बड़ी चिंता बने हुए हैं।

US Fed ने 28 अक्टूबर 2026 को हुई बैठक में ब्याज दरों को 3.75% से 4% के दायरे में बरकरार रखा। यह फैसला बाजार की उम्मीदों के मुताबिक रहा। ऐसे में अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि आने वाले महीनों में अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लेकर क्या रुख अपनाता है।
US Fed के फैसले का भारतीय शेयर बाजार पर क्या असर?
US Fed के ब्याज दरें स्थिर रखने के फैसले से भारतीय शेयर बाजार में तुरंत बड़ी तेजी आने की संभावना कम है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बाजार पहले से ही इस फैसले की उम्मीद कर रहा था। ऐसे में फैसले में कोई बड़ा सरप्राइज नहीं मिला। Geojit Investments के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार के मुताबिक, ब्याज दरों पर रोक का फैसला बाजार पहले ही अपने हिसाब से शामिल कर चुका था। हालांकि, बाजार के कई हिस्सों में वैल्यूएशन आकर्षक होने के कारण वैल्यू बाइंग देखने को मिल रही है। Equinomics Research के फाउंडर और हेड ऑफ रिसर्च जी. चोकलिंगम ने भी कहा कि भारतीय बाजार के लिए इस समय अमेरिकी ब्याज दरों से ज्यादा बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतें हैं। Brent Crude करीब 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर होने से भारत पर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। Ventura के हेड ऑफ रिसर्च विनीत बोलिंजकर के मुताबिक, केवल ब्याज दरों पर रोक लगाना नीति में बदलाव का संकेत नहीं है। बाजार की आगे की दिशा इस बात पर भी निर्भर करेगी कि Fed महंगाई को लेकर क्या संकेत देता है। इसके अलावा, भारत में कच्चे तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और कंपनियों के तिमाही नतीजे भी अहम रहेंगे।
Sensex और Nifty में आएगी तेजी?
US Fed के फैसले के बाद भारतीय बाजार में बड़ी तेजी की उम्मीद करना फिलहाल मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार पर दबाव बनाए हुए हैं। 29 अक्टूबर की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी 10 साल के बॉन्ड की यील्ड पिछले कारोबारी सत्र के 4.993% से बढ़कर 5.046% हो गई। जब अमेरिकी बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय शेयर बाजार जैसे उभरते बाजारों में निवेश की तुलना में अमेरिकी एसेट्स ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं। मास्टर कैपिटल सर्विसेज के चीफ रिसर्च ऑफिसर रवि सिंह के मुताबिक, Fed का ब्याज दरें स्थिर रखने का फैसला ग्लोबल मार्केट में स्थिरता ला सकता है और निवेशकों की धारणा को सपोर्ट कर सकता है। हालांकि, भारतीय बाजार में तेजी सीमित रह सकती है। विदेशी निवेशकों के फ्लो, कच्चे तेल की कीमतें और कंपनियों के नतीजे आगे भी बाजार की दिशा तय करेंगे।
Crude Oil की कीमतें भारत के लिए क्यों हैं बड़ी चिंता?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से देश का इंपोर्ट बिल बढ़ता है। इसका असर रुपये, महंगाई और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इससे कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। वहीं, रुपये में कमजोरी से आयात महंगा हो सकता है और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है। जी. चोकलिंगम के मुताबिक, जब तक कच्चे तेल की कीमतों में 5-10% की गिरावट के संकेत नहीं मिलते, तब तक भारतीय बाजार में बड़ी तेजी की संभावना सीमित रह सकती है।
FII Selling कब रुकेगी?
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs की बिकवाली के पीछे रुपये की कमजोरी और IPO बाजार में बड़ी रकम का निवेश जाना भी अहम वजहें हैं। जी. चोकलिंगम के मुताबिक, IPO में बड़ी मात्रा में पैसा लगाने के कारण विदेशी निवेशकों के पास सेकेंडरी मार्केट यानी स्टॉक एक्सचेंज पर पहले से लिस्टेड शेयरों में निवेश के लिए उपलब्ध रकम प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से रुपये पर दबाव बने रहने की आशंका है। उनके अनुसार, मौजूदा तेल कीमतों पर भारत का मासिक ऑयल इंपोर्ट बिल करीब 15-16 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे रुपये का आउटलुक प्रभावित हो सकता है और विदेशी निवेशकों की वापसी में देरी हो सकती है।
हालांकि, बाजार में वैल्यूएशन आकर्षक होने पर घरेलू और विदेशी निवेशकों की तरफ से चुनिंदा शेयरों में खरीदारी देखने को मिल सकती है।
दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं अमेरिकी ब्याज दरें?
अब बाजार की नजर दिसंबर में होने वाली Fed की अगली बैठक पर भी है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि महंगाई, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े आंकड़े अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी के पक्ष में रहे, तो दिसंबर में एक और बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। LPL Financial के चीफ इकोनॉमिस्ट जेफ्री रोच के मुताबिक, Fed के बयान से दिसंबर में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना के संकेत मिलते हैं। हालांकि, अगली बैठक से पहले आने वाले आर्थिक आंकड़े इस अनुमान को बदल भी सकते हैं। इसलिए निवेशकों के लिए सिर्फ मौजूदा फैसले पर ध्यान देना काफी नहीं होगा। Fed के आगे के संकेत, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री और कंपनियों के नतीजों पर भी नजर रखनी होगी।
कुल मिलाकर, US Fed ने ब्याज दरों को स्थिर रखकर फिलहाल किसी नई बढ़ोतरी से राहत दी है, लेकिन इससे भारतीय शेयर बाजार में तेजी की गारंटी नहीं मिलती। बाजार की अगली दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतों में कितनी राहत मिलती है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली कब थमती है।
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