Trump Russia Oil: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने 16 अक्टूबर 2026 को एक Executive Order जारी कर Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 के तहत आने वाले कुछ sanctions, restrictions और duties को फिलहाल waive कर दिया। इस कानून में रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान था।

इस फैसले से भारत को फिलहाल बड़ी राहत मिली है। इससे पहले आशंका थी कि रूसी तेल की खरीद जारी रखने पर भारतीय सामानों को अमेरिकी बाजार में अतिरिक्त टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात और दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता पर पड़ सकता था।
हालांकि, यह राहत स्थायी नहीं है। Executive Order के मुताबिक, संबंधित छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक अमेरिकी राष्ट्रपति या निर्धारित अधिकारी आगे कार्रवाई को उचित नहीं मानते। यानी भविष्य में अमेरिकी नीति बदलने की संभावना बनी हुई है।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों है अहम?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और सप्लाई में बदलाव का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप के कई देशों ने रूसी तेल से दूरी बनाई, जिसके बाद रूस ने एशियाई बाजारों में अपनी सप्लाई बढ़ाई। भारत ने भी रूसी Urals crude की खरीद बढ़ाई, क्योंकि अनुकूल कीमतों पर मिलने वाला तेल रिफाइनरियों की लागत कम करने में मदद कर सकता है।
लेकिन अब सिर्फ रूसी तेल की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उसकी कीमत, परिवहन खर्च और बीमा लागत भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। अगर इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद रूसी तेल दूसरे विकल्पों के मुकाबले सस्ता रहता है, तभी उसकी खरीद से वास्तविक आर्थिक फायदा मिलेगा।
चीन से बढ़ रहा Competition
अमेरिकी टैरिफ का खतरा कम होने के बावजूद भारत के सामने एक दूसरी चुनौती है-रूसी तेल की सप्लाई के लिए चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की मजबूत मांग और रूस से सीमित उपलब्धता के कारण भारतीय रिफाइनरियों को अक्टूबर और नवंबर में रूसी तेल की सप्लाई में कमी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में भारत को दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदने की जरूरत बढ़ सकती है।
Kpler के शिप-ट्रैकिंग आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, भारत सितंबर 2026 में रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना रहा, लेकिन जुलाई के मुकाबले आयात लगभग 29% कम हो गया। इसी दौरान चीन की खरीद ने बाजार में उपलब्ध रूसी तेल पर दबाव बढ़ाया।
इसका मतलब है कि टैरिफ का खतरा कम होने से भारत को रूसी तेल खरीदने के फैसले में राहत जरूर मिली है, लेकिन इससे तेल की उपलब्धता बढ़ना तय नहीं है। अगर चीन ज्यादा कीमत देकर पहले ही कार्गो बुक कर लेता है, तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो सकती है।
क्या रूसी तेल अब भी सस्ता है?
रूसी तेल की खरीद का एक बड़ा कारण उसका Brent crude के मुकाबले मिलने वाला डिस्काउंट रहा है। लेकिन यह अंतर समय और बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से बदलता रहता है।
भारतीय रिफाइनरियों को तेल की वास्तविक लागत तय करते समय सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कीमत नहीं, बल्कि शिपिंग, बीमा और अन्य खर्चों को भी देखना होता है। अगर रूसी Urals crude का डिस्काउंट कम हो जाता है, तो Middle East से मिलने वाला तेल भी प्रतिस्पर्धी विकल्प बन सकता है।
इसके अलावा, वैश्विक तनाव और सप्लाई में बाधा के कारण तेल की कीमतों में तेजी से बदलाव हो सकता है। इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि रूसी तेल हमेशा दूसरे विकल्पों से सस्ता रहेगा।
भारत को आगे क्या करना चाहिए?
भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह अपनी तेल खरीद में संतुलन बनाए रखे। रूस से सस्ता और उपलब्ध तेल मिलने पर खरीद जारी रखना आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है। वहीं, सप्लाई या कीमतों में बदलाव होने पर दूसरे देशों से खरीद बढ़ाने का विकल्प भी खुला रहना चाहिए।
इसके तीन प्रमुख पहलू हैं:
- पहला, सप्लाई में विविधता: भारत को रूस के अलावा Middle East और दूसरे उत्पादक देशों से भी तेल खरीदने के विकल्प बनाए रखने चाहिए।
- दूसरा, लागत पर ध्यान: रूसी तेल की खरीद का फैसला डिस्काउंट, शिपिंग और बीमा समेत कुल लागत के आधार पर होना चाहिए।
- तीसरा, आर्थिक हितों को प्राथमिकता: भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि किसी एक देश की नीतियों में बदलाव से तेल की सप्लाई पर अत्यधिक असर न पड़े।
Donald Trump के फैसले से भारत को रूसी तेल की खरीद को लेकर 100% तक अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ के खतरे से फिलहाल राहत मिली है। इससे भारतीय निर्यातकों और India-US trade talks को भी कुछ राहत मिल सकती है।
लेकिन असली चुनौती अब भी बनी हुई है। चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, रूसी तेल की उपलब्धता और कीमतों में बदलाव भारत के लिए अहम रहेंगे। ऐसे में भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह किस कीमत पर तेल खरीद पाता है और सप्लाई के कितने विकल्प अपने पास बनाए रखता है।


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