अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का फैसला कर सकते हैं। ट्रम्प इस बिल पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, जिसके बाद यह कानून बन गया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने बुधवार को रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने वाले 5 देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने वाले बिल को मंजूरी दी। बिल के पक्ष में 262 वोट पड़े, जबकि 159 सांसदों ने इसका विरोध किया। इससे पहले अगस्त में अमेरिकी सीनेट भी इसे 86-11 के वोट से पास कर चुकी है।

इस कानून का आधिकारिक नाम 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' है। रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले जिन 5 देशों को अमेरिकी लिस्ट में शामिल किया गया है, उनमें भारत के अलावा चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं।
भारत के लिए मामला गंभीर-
भारत के लिए यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। रूस पिछले कुछ समय से भारत के प्रमुख तेल सप्लायरों में शामिल है। अगस्त में भारत ने रूस से करीब 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया था, जो कुल क्रूड इंपोर्ट का करीब 45 फीसदी था।
भारत के तेल बाज़ार पर असर-
अगर अमेरिका भारत के सामान पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो इसका असर सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापार पर नहीं पड़ेगा, बल्कि तेल बाजार पर भी इसका असर दिख सकता है। भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने सितंबर और अक्टूबर के लिए रूसी तेल की कुछ खरीद पहले से तय कर रखी है। रिफाइनर्स का कहना है कि अगर रूसी तेल की सप्लाई में बड़ी रुकावट आती है, तो उन्हें दूसरे देशों से महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है और घरेलू बाजार में भी ईंधन की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
"देश की प्राथमिकता अपनी ऊर्जा सुरक्षा"
भारत सरकार ने भी साफ किया है कि देश की प्राथमिकता अपनी ऊर्जा सुरक्षा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक भारत अलग-अलग देशों से तेल की सप्लाई लेने की नीति पर आगे बढ़ेगा और बदलती बाजार परिस्थितियों के हिसाब से फैसले करेगा। सरकार ने यह भी कहा है कि वह इस मामले के असर से निपटने के लिए व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करेगी।
ट्रेड डील पर भी असर संभव-
इस पूरे मामले का असर भारत-अमेरिका व्यापार बातचीत पर भी पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है और रूस से तेल खरीद का मुद्दा इसमें एक अहम विषय बन चुका है। भारत के लिए चुनौती यह है कि उसे एक तरफ सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सप्लाई बनाए रखनी है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों को भी संभालना है।
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