Indian Share Market की Valuation मई 2020 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। इसके बावजूद विदेशी निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर खरीदारी करने से बच रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की महंगी Valuation, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और Corporate Earnings को लेकर चिंता है। वहीं, घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) लगातार खरीदारी करके बाजार को सहारा दे रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या भारतीय शेयर बाजार में निवेश का मौका बन रहा है या अभी और गिरावट का जोखिम बाकी है?

6 साल के निचले स्तर पर भारतीय बाजार की Valuation
भारतीय शेयर बाजार की Valuation में इस साल बड़ी गिरावट देखने को मिली है। MSCI India Index का 12-month Forward Price-to-Earnings (P/E) Multiple घटकर 18.5 गुना रह गया है। यह मई 2020 के बाद का सबसे निचला स्तर है। सितंबर 2024 में यह Multiple 24.54 गुना के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, जबकि 2026 की शुरुआत में यह करीब 22.5 गुना था। वहीं, इसका 10 साल का औसत 19.7 गुना है। यानी भारतीय बाजार की Valuation अब अपने ऐतिहासिक औसत से भी नीचे आ गई है।
हालांकि, सिर्फ Valuation में गिरावट के आधार पर यह मानना सही नहीं होगा कि भारतीय शेयर बाजार अब पूरी तरह सस्ता हो गया है। इसकी असली तस्वीर दूसरे देशों के बाजारों से तुलना करने पर सामने आती है।
Indian Share Market vs Emerging Markets
MSCI Emerging Markets Index का Forward P/E फिलहाल करीब 8.7 गुना है, जबकि इसका 10 साल का औसत 12.05 गुना है। इस साल की शुरुआत में यह Valuation करीब 13.3 गुना थी। इस तुलना में MSCI India का 18.5 गुना Forward P/E लगभग दोगुना है। यानी भारतीय बाजार अपनी पिछली Valuation के मुकाबले सस्ता हुआ है, लेकिन दूसरे Emerging Markets के मुकाबले अभी भी महंगा है।
दूसरे बाजारों पर नजर डालें तो MSCI US का Forward P/E करीब 18.8 गुना है, जबकि इसका 10 साल का औसत 19.2 गुना है। Taiwan का P/E 16.8 गुना और Japan का 15.4 गुना है। वहीं, China का P/E करीब 9.2 गुना है। इसका मतलब है कि भारत की Valuation Taiwan और Japan से अधिक, अमेरिका के लगभग बराबर और China तथा पूरे Emerging Markets के मुकाबले काफी ऊंची है।
भारत को ऐतिहासिक रूप से Premium Valuation मिलने के पीछे स्थिर Corporate Earnings की उम्मीद, बड़ा घरेलू बाजार और कंपनियों की लंबी अवधि की Growth संभावनाएं रही हैं। लेकिन अब Global Investors दूसरे बाजारों में भी बेहतर मौके तलाश रहे हैं। Taiwan और South Korea जैसे बाजारों में Semiconductor, Artificial Intelligence और Data Centre से जुड़ी कंपनियों की Growth संभावनाएं निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं। ऐसे में विदेशी निवेशकों के लिए सिर्फ भारत की Growth Story पर्याप्त नहीं है। वे यह भी देख रहे हैं कि किस बाजार में कम Valuation पर बेहतर Earnings Growth मिल सकती है।
FIIs की बिकवाली से बाजार पर दबाव
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 24 अक्टूबर तक FIIs भारतीय Equities से करीब 48,056 करोड़ रुपये की Net निकासी कर चुके थे। इसके साथ ही 2026 में अब तक कुल FPI Outflow करीब 3.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि 2025 के पूरे साल में यह लगभग 1.66 लाख करोड़ रुपये था। हालांकि, विदेशी निवेशकों की बिकवाली की रफ्तार में कुछ कमी के संकेत भी दिखाई दिए हैं। पिछले सप्ताह FIIs लगातार 10वें सप्ताह Net Sellers रहे, लेकिन उनकी साप्ताहिक बिकवाली 8,991 करोड़ रुपये से घटकर 2,697 करोड़ रुपये रह गई।
23 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान दो Trading Sessions में FIIs ने Net Buying भी की। इससे पहले 16 अक्टूबर को लगातार 15 Sessions की बिकवाली के बाद उन्होंने करीब 1,166 करोड़ रुपये की Net Buying की थी। इससे संकेत मिलता है कि विदेशी निवेशक फिलहाल भारतीय बाजार से पूरी तरह दूरी नहीं बना रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर दोबारा निवेश शुरू करने को लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं। उनका रुख चुनिंदा शेयरों और Sectors तक सीमित रह सकता है।
FIIs की बिकवाली के 5 बड़े कारण
1. महंगा Crude Oil
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय बाजार के लिए बड़ी चुनौती है। Crude Oil करीब 114 डॉलर प्रति Barrel तक पहुंचने से भारत के Import Bill पर दबाव बढ़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में महंगा Crude रुपये, महंगाई और कंपनियों के Profit Margins को प्रभावित कर सकता है।
2. Middle East में बढ़ता तनाव
Geopolitical Tensions के कारण Global Markets में अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं। Emerging Markets में निवेश पर इसका सीधा असर पड़ता है।
3. Inflation और Interest Rates की चिंता
Crude Oil और अन्य Input Costs महंगे होने से महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है। अगर Inflation पर दबाव बढ़ता है, तो ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है। इसका असर शेयर बाजार की Valuation और कंपनियों की Growth पर पड़ सकता है।
4. Corporate Earnings को लेकर चिंता
कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजे मिले-जुले रहे हैं। अगर महंगा Crude और कमजोर मांग कंपनियों के Margins को प्रभावित करते हैं, तो आने वाली तिमाहियों में Profit Estimates में कटौती हो सकती है। ऐसी स्थिति में मौजूदा Valuation भी निवेशकों को आकर्षक नहीं लगेगी।
5. मजबूत डॉलर और ऊंची US Bond Yields
जब अमेरिका में अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश विकल्पों पर बेहतर Return मिलता है, तो Global Investors उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। इसके अलावा, रुपये की कमजोरी से विदेशी निवेशकों के डॉलर में मिलने वाले Return पर भी असर पड़ता है। इससे भारतीय बाजार में निवेश का आकर्षण कम हो सकता है।
इन सभी कारणों का संयुक्त असर भारतीय बाजार पर दिखाई दे रहा है। महंगा Crude, कमजोर रुपया, Earnings को लेकर चिंता और ऊंची Valuation मिलकर विदेशी निवेशकों को सतर्क रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
Financial Services और FMCG में सबसे ज्यादा बिकवाली
अक्टूबर के पहले पखवाड़े में Financial Services Sector में FIIs ने सबसे ज्यादा करीब 8,634 करोड़ रुपये की बिकवाली की। इसके बाद FMCG में 8,172 करोड़ रुपये, Auto और Auto Components में 6,533 करोड़ रुपये तथा Healthcare में करीब 5,500 करोड़ रुपये की निकासी हुई। इसके अलावा Telecom में 3,928 करोड़ रुपये, Capital Goods में 3,886 करोड़ रुपये, Metals में 3,693 करोड़ रुपये और Oil & Gas में 3,689 करोड़ रुपये की बिकवाली दर्ज की गई।
Financial Services Sector पर दबाव केवल अक्टूबर तक सीमित नहीं है। अप्रैल से सितंबर के मध्य तक इस Sector से करीब 47,030 करोड़ रुपये निकल चुके थे। Banking कंपनियों के नतीजों और भविष्य की Earnings Growth को लेकर चिंताओं ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। FMCG Sector में महंगा Crude, ग्रामीण मांग में धीमा सुधार और Margins पर दबाव चिंता की वजह बने हुए हैं। Healthcare और Telecom में भी विदेशी निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी घटाई है।
IT Sector में FIIs की बढ़ी दिलचस्पी
बाजार में बिकवाली के बीच IT Sector एक अपवाद के रूप में सामने आया है। अक्टूबर के पहले पखवाड़े में FIIs ने IT Stocks में करीब 2,599 करोड़ रुपये की Net Buying की, जबकि सितंबर में इस Sector में करीब 1,000 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई थी। यह बदलाव बताता है कि विदेशी निवेशक सभी Sectors से एक समान तरीके से पैसा नहीं निकाल रहे हैं। वे बाजार में अपने निवेश का पुनर्गठन कर रहे हैं और उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर अवसर दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, IT Sector में खरीदारी बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि इस Sector में जोखिम खत्म हो गया है। निवेशकों को कंपनियों की Valuation, भविष्य की Earnings और मांग की स्थिति को ध्यान में रखकर ही फैसला लेना चाहिए।
DIIs ने कैसे संभाला बाजार?
जहां FIIs लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं Domestic Institutional Investors यानी DIIs भारतीय शेयर बाजार को सहारा दे रहे हैं। Mutual Funds, Insurance Companies और अन्य घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली के असर को काफी हद तक कम किया है। अक्टूबर के पहले 12 Trading Sessions में DIIs ने करीब 47,895 करोड़ रुपये की Net Buying की, जबकि FIIs ने 45,934 करोड़ रुपये की बिकवाली की। पिछले सप्ताह भी DIIs ने हर Trading Session में खरीदारी की और कुल 10,942 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। Financials, FMCG और PSU Stocks जैसे क्षेत्रों में घरेलू निवेशकों की दिलचस्पी दिखाई दे रही है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि DIIs उन्हीं शेयरों को खरीद रहे हों जिन्हें FIIs बेच रहे हैं। घरेलू निवेशकों की खरीदारी अक्सर Large-Cap, Quality Stocks और प्रमुख Index में ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाली कंपनियों पर केंद्रित रहती है।
इसलिए DIIs की खरीदारी बाजार को सहारा जरूर दे रही है, लेकिन इससे बाजार में गिरावट का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।
Global Markets के मुकाबले भारत का प्रदर्शन कमजोर
भारतीय बाजार की Valuation में गिरावट के बावजूद इस साल Global Markets के मुकाबले इसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। डॉलर के हिसाब से 2026 में अब तक Sensex करीब 18%, Nifty 19% और MSCI India 15.4% गिर चुका है। इसके मुकाबले MSCI China में करीब 20% की गिरावट आई है, जबकि MSCI US लगभग 12% ऊपर है। Taiwan का बाजार करीब 57% और Japan का बाजार लगभग 17% ऊपर रहा है। यह अंतर बताता है कि सिर्फ Valuation में गिरावट से विदेशी निवेशकों की वापसी सुनिश्चित नहीं होती। निवेशक उन बाजारों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जहां उन्हें बेहतर Growth और Return की संभावना दिखाई देती है। इसके अलावा, Large-Cap Stocks की Valuation में सुधार के बावजूद Mid-Cap और Small-Cap Stocks में जोखिम बना हुआ है। इन शेयरों की Valuation अपनी ऐतिहासिक Median से करीब 50% से 70% Premium पर बताई जा रही है। इसका मतलब है कि पूरे बाजार में एक समान Valuation Correction नहीं आया है।
भारतीय निवेशकों के लिए खरीदारी का मौका?
भारतीय निवेशकों के लिए मौजूदा बाजार में अवसर और जोखिम, दोनों मौजूद हैं। Large-Cap Stocks की Valuation ऐतिहासिक औसत से नीचे आने के कारण लंबी अवधि के निवेशकों के लिए धीरे-धीरे निवेश करने का अवसर बन सकता है। नियमित निवेश करने वाले निवेशक अपनी वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता के अनुसार SIP जारी रखने पर विचार कर सकते हैं। दूसरी ओर, Mid-Cap और Small-Cap Stocks में Valuation का सुधार अभी अधूरा है। ऐसे में तेजी देखकर एकमुश्त बड़ी रकम निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।
Crude Oil की कीमतों और Interest Rates से प्रभावित Sectors में भी सावधानी जरूरी है। Oil Marketing Companies, Paints, Autos, Aviation, Cement और Consumer Discretionary जैसे क्षेत्रों में महंगे Crude के कारण कंपनियों की लागत और Margins पर दबाव पड़ सकता है।
IT Sector में अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई दे रही है, लेकिन यहां भी सिर्फ हालिया खरीदारी के आधार पर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए। कंपनियों की Earnings Growth और Valuation को ध्यान में रखना जरूरी है। सबसे अहम बात यह है कि Forward P/E को भविष्य की Earnings के अनुमान के साथ समझना चाहिए। अगर Crude Oil लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति Barrel से ऊपर बना रहता है और कंपनियों के Profit Estimates घटते हैं, तो मौजूदा Valuation उतनी आकर्षक नहीं रह जाएगी जितनी पहली नजर में दिखाई देती है।
FIIs की वापसी कब होगी?
विदेशी निवेशकों की बड़े पैमाने पर वापसी के लिए कई परिस्थितियों में सुधार जरूरी होगा। Crude Oil की कीमतों में नरमी, रुपये में स्थिरता, Corporate Earnings में सुधार और Global Interest Rates का अनुकूल होना भारतीय बाजार के लिए सकारात्मक संकेत हो सकते हैं। इसके साथ ही, भारत और दूसरे Emerging Markets के बीच Valuation का अंतर भी महत्वपूर्ण रहेगा। जब तक विदेशी निवेशकों को भारत में बेहतर Earnings Growth के साथ उचित Valuation नहीं दिखती, तब तक बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू होने की संभावना सीमित रह सकती है।
कुल मिलाकर, भारतीय शेयर बाजार की Valuation छह साल के निचले स्तर पर जरूर पहुंच गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार हर पैमाने पर सस्ता हो गया है। FIIs की बिकवाली की रफ्तार कम होने के संकेत हैं, जबकि DIIs लगातार खरीदारी करके बाजार को सहारा दे रहे हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे सिर्फ बाजार की गिरावट देखकर निवेश का फैसला न करें। Valuation, Earnings Growth, Crude Oil की कीमतों और Global Market Conditions को साथ में समझना जरूरी है। भारतीय बाजार में अवसर बन रहे हैं, लेकिन सही शेयरों का चुनाव और निवेश में अनुशासन पहले से ज्यादा अहम हो गया है।


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