Budget 2024: पिछले कुछ सालों में यूनियन बजट में बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़े ऐलान नहीं हुए हैं। सरकार केंद्रीय बजट 2024 सत्र के दौरान कई बैंकिंग कानूनों में संशोधन पर विचार कर रही है। केंद्र की नई एनडीए सरकार के पास इस बार बजट में बड़े रिफॉर्म्स के लिए मौका है। वह सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन पर फोकस बढ़ा सकती है।

बैंकिंग कानूनों में किया जा सकता है बदलाव
बैंकिंग विनियमन अधिनियम तथा अन्य कानूनों, जैसे बैंकिंग कंपनियां अधिनियम, 1970 और 1980 में संशोधन किया जा सकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इससे पहले केंद्रीय बजट 2021 के दौरान भी इसी तरह के संशोधनों का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की योजना की घोषणा की थी। हालांकि, उस समय ये प्रस्ताव अमल में नहीं आए।
केयर रेटिंग्स के डेटा के मुताबिक, बैंकों का ग्रॉस क्रेडिट ऑफटेक मई में 16.1 फीसदी बढ़ा है। यह साल दर साल आधार पर 0.70 फीसदी ज्यादा है। ज्यादातर सरकारी बैंकों के शेयरों में पिछले एक साल में तेजी देखने को मिली है। निवेशकों ने सरकारी बैंकों के शेयरों को खरीदने में दिलचस्पी भी दिखाई है। ऐसे में यह सरकार के लिए सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर अच्छा पैसा हासिल करने का सही वक्त है।
कुछ सरकारी बैंकों का हो सकता है विलय
भारत में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण बैंक विलय हुए हैं। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया और ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का पंजाब नेशनल बैंक में विलय कर दिया गया, जिससे भारत का दूसरा सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक बना। सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय कर दिया गया, जबकि इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में विलय कर दिया गया।
इसके अलावा, आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में एकीकृत किया गया। 2019 में एक उल्लेखनीय विलय में, विजया बैंक और देना बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में शामिल कर लिया गया। इससे पहले, अप्रैल 2017 में, एसबीआई ने पांच सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का अपने में विलय कर लिया था।
एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार कुछ सरकारी बैंकों के विलय के बारे में भी सोच रही है। इसमें यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, पंजाब एंड सिंध बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया शामिल होंगे। विलय में बैंकों को नई पूंजी नहीं मिलती है और न ही उनके वर्क कल्चर में बदलाव आता है। RBI की जून की फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट (FSR) के मुताबिक बैंकों का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPA) रेशियो घटकर मार्च 2024 में 2.8 फीसदी पर आ गया, जो 12 साल में सबसे कम है।
इन रणनीतिक कदमों से बैंकिंग क्षेत्र के समग्र स्वास्थ्य को मजबूती मिलने और भारत की आर्थिक वृद्धि में सकारात्मक योगदान मिलने की उम्मीद है।
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