नई दिल्ली, जनवरी 22। आगामी बजट पेश किए जाने में 10 दिन का समय बचा है। ऐसे में संभावनाएं जताई जा रही हैं कि बैंकों के प्राइवेटाइजेशन को लेकर नये सिरे से कोई अहम ऐलान किया जा सकता है। बैंकिंग कंपनी (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) अधिनियम, 1970 और बैंकिंग कंपनी (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) अधिनियम, 1980 दो प्रमुख कानून हैं, जिनसे सरकार ने सभी प्राइवेट बैंकों का अधिग्रहण किया। सरकार से उम्मीद की जा रही थी कि वह 2021 के बजट सत्र के दौरान और फिर बाद में संसद के हाल ही में संपन्न शीतकालीन सत्र के दौरान इन कानूनों में बदलाव करेगी।

अब क्या हो सकता है
बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन करके दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के तेजी से प्राइवेटाइजेशन का रास्ता साफ करने की उम्मीद की गई थी, जिसकी घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2021-22 में 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के तहत की थी। बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार अब वित्त मंत्रालय सरकारी बैंकों में सॉवरेन शेयरहोल्डिंग को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मिलकर काम कर रहा है।
26 फीसदी तक कम होगी हिस्सेदारी
चर्चा ये है कि सरकार सभी पीएसयू बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को 26 प्रतिशत तक कम करने का प्रस्ताव ला सकती है। वर्तमान में कानून के अनुसार सरकार को 12 पीएसबी में हर समय 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने की आवश्यकता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को मौजूदा 20 प्रतिशत से अधिक करने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। निजी बैंकों के पास ऑटोमैटेड रूट के माध्यम से 74 प्रतिशत की एफडीआई लिमिट है, बशर्ते नियंत्रण और प्रबंधन में कोई बदलाव न हो।
अगले वित्त वर्ष में होगा प्राइवेटाइजेशन
एक अधिकारी के अनुसार पिछले बजट में घोषित दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण अभी नहीं हुआ है। बजट में नये ऐलान से ये टास्क अपने आप अगले वित्त वर्ष के लिए टल जाएगा।


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