नई दिल्ली, जनवरी 10। कुछ दिन बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपना चौथा बजट पेश करेंगी। ये बजट थोड़ा ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि देश कोविड-19 महामारी की तीसरी लहर का सामना कर रहा है। आर्थिक सुधारों को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, जबकि इकोनॉमी को गति देने के लिए बहुत कम विकल्प हैं। राजकोषीय घाटा पहले से ही बढ़ा हुआ है और और नहीं बढ़ाया जा सकता है। वैसे भी उच्च मुद्रास्फीति (हाई इंफ्लेशन) और चालू खाता घाटा इसे न चाहने वाला विकल्प बनाते हैं। जब वित्त मंत्री अगले महीने बजट पेश करेंगी तो उनके सामने कई चुनौतियां होंगी।

विकास दर के लिए अनुमान
सबसे पहले जीडीपी ग्रोथ रेट की बात करना जरूरी है। ओमिक्रॉन के मामले बढ़ते ही भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमानों में कमी का दौर शुरू हो गया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की तरफ से जारी किए अग्रिम अनुमानों के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की अर्थव्यवस्था के 9.2 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है। जबकि पिछले महीने आरबीआई ने 9.5 फीसदी का अनुमान लगाया था। वहीं जीडीपी को कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच राज्यों की तरफ से प्रतिबंध लगाए जाने से नुकसान हो सकता है।
बढ़ती महंगाई और चालू खाता घाटा
बढ़ती महंगाई एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में आरबीआई को दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है, जबकि सरकार को राजकोषीय घाटे की फिक्र करनी होगी। थोक महंगाई मार्च 2021 में 7.89 फीसदी से नवंबर में 14.23 फीसदी तक पहुंच गयी। मगर इसी दौरान खुदरा महंगाई 5.52 फीसदी से 4.91 फीसदी पर आ गयी। वहीं राजकोषीय घाटे के लिए बजट अनुमान जीडीपी के चालू वित्त वर्ष में 6.8 फीसदी रहने का है। उच्च चालू खाता भी एक समस्या है, जो जुलाई-सितंबर में डेफिसिट में पहुंच गया। तब ये जीडीपी के -1.3 फीसदी पर था।
सार्वजनिक पूंजीगत व्यय
सरकार को सार्वजनिक पूंजीगत व्यय भी बरकरार रखना होगा। 2021-22 के लिए बजट में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय 554236 करोड़ रु तय किया गया था, जो कुल बजट का 15.9 फीसदी था। ये 2020-21 के लिए बजट का 12.7 फीसदी था। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय से जीडीपी को अस्फीतिकारी (नॉन-इंफ्लेशनरी) फायदा होगा। इसके अलावा सरकार को खपत बढ़ाने, इनकम टैक्स स्लैब को और बेहतर बनाने और जीएसटी दरों को उचित करने पर ध्यान देना होगा। सरकार के लिए विदेशी निवेश और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बेहतर बनाने की भी चुनौती होगी।
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