Bakrid 2024: सऊदी अरब और भारत में इस दिन मनाई जाएगी ईद-उल-अज़हा, जानें क्या है इस त्योहार के मायने

Bakra Eid 2024: ईद-उल-अज़हा जिसे बकरीद के नाम से भी जाना जाता है, इस्लामी कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह पैगंबर इब्राहिम द्वारा ईश्वर के प्रति समर्पण के रूप में अपने बेटे की बलि देने की इच्छा को याद करता है। ईद-उल-अज़हा का त्योहारों हमेशा से चांद देखकर ही मनाया जाता रहा है, वैसे ही इस बार 2024 में 16 या 17 जून को होना का उम्मीद है।

सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और ओमान जैसे देशों में यह 16 जून को मनाया जाने की संभावना है। भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण एशियाई देशों में यह चांद दिखने पर निर्भर करते हुए 17 जून या 18 जून को मनाया जाएगा। यह त्यौहार परिवारों और समुदायों को भक्ति और दान के लिए एक साथ लाता है।

Bakrid

महत्व और धार्मिक क्रिया

बकरीद हज यात्रा के बाद मनाई जाती है और इसे ईद-उल-अज़हा या ईद-उल-अदहा के नाम से भी जाना जाता है। आपको ये पता होना इसे "बलिदान का त्यौहार" कहा जाता है क्योंकि यह पैगंबर इब्राहिम की अल्लाह के प्रति समर्पण दिखाने के लिए अपने बेटे की बलि देने की इच्छा को याद करता है। मुसलमान इस चीज को जानवरों की कुर्बानी देकर और मांस को अपने घरों, रिश्तेदारों और गरीबों के साथ साझा करके मनाते हैं। इस कुर्बानी का खास महत्व ये भी है अल्लाह हमेशा प्रति हमेशा अपना ध्यान लगाए रखना।

ईद-उल-अदहा की तारीखें नए चांद के दिखने पर तय होती हैं, जो इस्लामी महीने ज़ुल हिज्जा की शुरुआत का प्रतीक है। यह फंक्शन तीन दिनों तक चलता है और इसमें अल्लाह के प्रति अपना ध्यान लगाना होता है, दावतें और सामाजिक समारोह शामिल होते हैं। मुख्य धार्मिक क्रिया में से एक है कुर्बानी, या किसी जानवर की कुर्बानी देना।

समुदाय और दान

कुर्बानी का मांस परिवार, दोस्तों और ज़रूरतमंदों में बांटा जाता है, जो साझा करने और दान की तरीके का एक प्रतीक है, इसका खास मकसद यह भी की गरीबों को भी कुर्बानी के मांस के जरिए उन्हे भी खाने को मिल जाए। यह त्यौहार विभिन्न संस्कृतियों और क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है, लेकिन प्रार्थना, बलिदान और दान के मूल तत्वों को बनाए रखता है। मुसलमान इस त्योहार के जरिए से बेहतरीन कपड़े पहनते हैं और नमाज पढ़ते हैं, दावतों और सामाजिक समारोहों के लिए इकट्ठा होते हैं।

यह त्यौहार एकता की भावना से चिह्नित है क्योंकि समुदाय एक साथ मिलकर जश्न मनाते हैं और अपने विश्वास पर विचार करते हैं। अपने मिलने जुलने वालों को अक्सर फंक्शन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है, और यह खुशी और एकता का समय है। मुसलमान पारंपरिक रूप से इस अवसर को चिह्नित करने के लिए अपने सबसे अच्छे कपड़े, अक्सर नए वस्त्र पहनते हैं।

समय और प्रतिबिंब

स्थानीय रीति-रिवाजों और परंपराओं के आधार पर यह फंक्शन दो से चार दिनों तक चल सकता है। ईद-उल-अज़हा मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण समय होता है इस व्यक्त लोग गरीबों को ज्यादा से ज्यादा दान देने की कोशिश में रहते हैं, क्योंकि ऐसा मानना है की इस समय जो लोग भी ज्यादा दान देते हैं, उनके कारोबार में काफी इजाफा देखने को मिलता है। इस त्योहार में लोग एक दूसरे नमाज के दौरान गले भी मिलते हैं और मुबारकबाद भी पेश करते हैं।

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