नयी दिल्ली। कोरोना संकट से निपटने के लिए मोदी सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज का ऐलान किया है। ये राहत पैकेज भारत की जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर है। इस पैकेज के जरिए कई सेक्टरों को राहत पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। मगर इससे वित्त वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का दोगुने से अधिक बढ़ होकर 7.9 फीसदी तक पहुंच सकता है। इस बात का खुलासा एसबीआई की एक रिसर्च रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रह सकता है। रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि राहत पैकेज और इससे पहले उठाए गए आर्थिक कदमों से कैश आउटफ्लो, हाल ही में बढ़ाई गई एक्साइज ड्यूटी और डीए (जो जीडीपी का करीब 0.8 फीसदी है) पर रोक को देखते हुए राजकोषीय घाटे का अनुमान 3.5 फीसदी से बढ़ा कर 7.9 फीसदी किया गया है। इसके पीछे बताए गए कारणों में कोरोना के कारण कम राजस्व और खर्चों में भी बढ़ोतरी शामिल है।

एसबीआई की Ecowrap में रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सीएसओ के पहले अनुमान के आधार पर बेसलाइन राजकोषीय घाटा जीडीपी का लगभग 7.1 प्रतिशत है। सरकारी इनकम में कमी / स्वचालित राजकोषीय स्थिरता के कारण राजकोषीय घाटे पर सीधे 4.5 प्रतिशत का असर पड़ने का अनुमान है। साथ ही जीडीपी परिवर्तन के कारण इसमें 0.9 प्रतिशत का इनडायरेक्ट असर पड़ेगा।
बता दें कि सरकार ने 4.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त लोन लेने का ऐलान किया है, जो जीडीपी का 2.1 फीसदी है। वैसे जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सरकार का कर्ज वित्त वर्ष 2010-11 से बढ़ रहा है। पिछले आठ सालों में वित्त वर्ष 2010-11 में सरकारी डेब्ट 62 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2018-19 में 66 प्रतिशत हो गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसी अवधि के दौरान ब्याज दर (रेपो रेट) 8.5 फीसदी से घट कर 6 फीसदी से भी कम हो गई है।


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