नयी दिल्ली। ब्रिटेन ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए अपने 5 जी नेटवर्क से चीनी टेलीकॉम दिग्गज हुआवेई को हटाने का फैसला ले लिया है। हालांकि इसके लिए ब्रिटेन को चीन की तरफ से जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। ब्रिटेन का इस कदम को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए चीन के साथ चल रहे भूराजनीतिक और व्यापार युद्ध में बड़ी जीत की तरह माना जा रहा है। हालांकि ब्रिटेन के इस फैसले से इसके चीन के साथ संबंधों को और नुकसान पहुंच सकता है। साथ ही अब ब्रिटेन की मोबाइल कंपनियों को भी अधिक लागत सहन करनी पड़ेगी, जो लगभग 20 वर्षों से हुआवेई के उपकरणों पर भरोसा करते रहे हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के अपने मंत्रिमंडल और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक के बाद वहां के डिजिटल मंत्री ओलिवर डाउडेन ने संसद में इस फैसले का ऐलान किया।

टेलीकॉम कंपनियों को चेतावनी
डाउडेन ने कहा कि इस साल के अंत से टेलीकॉम कंपनियां हुआवेई से कोई 5जी उपकरण नहीं खरीदेंगी। नए दिशानिर्देशों में 2026 के अंत तक ब्रिटेन से सभी मौजूदा हुआवेई गियर को हटाने की भी बात की गई है। जनवरी में जॉनसन ने चीन की प्रमुख 5जी कंपनी को ब्रिटेन के तेजी से नए डेटा नेटवर्क को शुरू करने में मदद करने की इजाजत दी थी। अपने इस फैसले जॉनसन ने ट्रम्प और अपनी ही कंजर्वेटिव पार्टी के कुछ सदस्यों को नाराज कर दिया था।
क्या थी ब्रिटेन का उद्देश्य
असल में ब्रिटेन तब यूरोपीय संघ से विदाई ले रहा था और शक्तिशाली एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ मजबूत संबंध स्थापित करना चाहता था। ताकि जॉनसन के "ग्लोबल ब्रिटेन" के विजन को पूरा किया जा सके। लेकिन ट्रम्प प्रशासन ने यूके सरकार को बताया कि इस फैसले से खुफिया जानकारी साझा होंगी। अमेरिका ने इंग्लैंड से अपने कुछ फाइटर जेट हटाने की भी धमकी दी थी। वाशिंगटन का मानना है कि प्राइवेट चीनी कंपनी युद्ध के समय में या तो बीजिंग के लिए जासूसी कर सकती है या प्रतिद्वंद्वी देशों के 5जी नेटवर्क को बंद कर सकती है। मगर हुआवेई ऐसे आरोपों को खारिज करती रही है।
ब्रिटेन से पहले भारत हुआ सख्त
चीन के साथ सीमा विवाद होने के बाद भारत भी ऐसा ही फैसला ले चुका है। केंद्र सरकार ने बीएसएनएल के 4जी नेटवर्क के लिए चीनी उपकरणों के इस्तेमाल को मना कर दिया था। इसके बाद कारोबार के लिहाज से भारत चीन के खिलाफ कई कार्रवाइयां कर चुका है।


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