नई दिल्ली, नवंबर 8। 5 साल पहले आज ही के दिन देश में नोटबंदी का ऐलान हुआ था। 8 नवंबर 2016 को 500 रु और 1000 रु के नोट बैन कर दिए गए थे। नोटबंदी के पीछे कई सरकार ने कई दलीलें दी थीं, जिनमें एक था डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिला भी है। मगर कैश का इस्तेमाल कम होने के बजाय और बढ़ा है। बल्कि इस समय कैश का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात के रूप में कैश का इस्तेमाल वित्त वर्ष 2020-21 में 14.5 फीसदी के नए उच्च स्तर पर पहुंच गया। ये उछाल महामारी के कारण नकदी की मांग में बढ़ोतरी और जीडीपी में गिरावट की वजह से आई। हालांकि नोटबंदी की पांचवीं वर्षगांठ पर डिजिटल भुगतान के हर फॉर्मेट में उछाल जारी है। फिर चाहे वह यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) हो या क्रेडिट-डेबिट कार्ड या फिर फास्टैग।
जानें पूरे आंकड़े
बता दें कि 2020-21 में 28.5 लाख करोड़ रु की नकदी चलन में रही। इससे पहले 2019-20 में 24.5 लाख करोड़ रु (जीडीपी का 12 फीसदी), 2018-19 में 21.3 लाख करोड़ रु (जीडीपी का 11.3 फीसदी), 2017-18 में 18.3 लाख करोड़ रु (जीडीपी का 10.7 फीसदी), 2016-17 में 12.6 लाख करोड़ रु (जीडीपी का 8.2 फीसदी) और 2015-16 में 16 लाख करोड़ रु (जीडीपी का 11.6 फीसदी) की नकदी चलन में थी।
कैश का चलन पूरी दुनिया में बढ़ा
महामारी आने के बाद कैश का इस्तेमाल पूरी दुनिया में बढ़ा है। यह अमेरिका, स्पेन, इटली, जर्मनी, फ्रांस, ब्राजील, रूस और तुर्की में देखा गया है। इस बीच, डिजिटल भुगतान वित्त वर्ष 2017-18 की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक हो गया है।
डिजिटल पेमेंट इंडेक्स
भारतीय रिज़र्व बैंक का डिजिटल भुगतान सूचकांक, जिसका आधार वर्ष 100 पर 2018 है, बढ़कर 270 हो गया है। यह सूचकांक भुगतान के इंफ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए डिजिटल पेमेंट के विस्तार को भी दर्शाता है।
तीन अहम उद्देश्य पूरे
नोटबंदी के चार प्रमुख उद्देश्यों में से, भारत ने तीन पर अच्छा प्रदर्शन किया है। डिजिटल लेनदेन में वृद्धि हुई है। इसके अलावा नकली नोटों में भी कमी आई है। नकली नोटों की संख्या वित्त वर्ष 2018-19 में 310,000 से गिरकर वित्त वर्ष 2019-20 में 290,000 और वित्त वर्ष 2020-21 में 200,000 तक आ गयी। इस बात के भी संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था अधिक फॉर्म्लाइज्ड हो रही है।
अनौपचारिक अर्थव्यवस्था घटी
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार एसबीआई समूह के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष के अनुसार ऐसे संकेतक हैं कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कुछ साल पहले जीडीपी के 40% से घटकर 20% रह गई है। यह यूरोप के बराबर है और लैटिन अमेरिकी देशों की तुलना में काफी बेहतर है जहां अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार 34% अनुमानित है।


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