टेलीकॉम कंपनियों के द्वारा मोबाइल कॉल पर पैसे वसूलने के नियमों में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। जी हां कर्ज से दबी टेलीकॉम कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए सरकार वॉइस कॉल का एक मिनिमम रेट तय करने की संभावना पर विचार कर रही है। मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि सरकार स्पेक्ट्रम पेमेंट में दो साल की छूट देने और बैंडविथ पेमेंट की अवधि 16 साल से आगे बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। इसके अलावा 36,000 करोड़ रुपये के जीएसटी रिफंड जारी करने पर भी चर्चा चल रही है।

यह मानना है 'फ्लोर टैरिफ' तय करने से बड़ा बदलाव होगा। अब तक टेलीकॉम कंपनियां ही इसे तय करती हैं। इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिर्पोट के अनुसार एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, "सभी दूसरे कदम इस सेक्टर के लिए स्टेरॉयड्स की तरह काम कर सकते हैं। लेकिन, मिनिमम टैरिफ तय करने का पहलू भी खंगाला जा रहा है।"
तो वहीं दूरसंचार नियामक ट्राई की सोच से वाकिफ एक अधिकारी ने कहा, भारत में टेलीकॉम कंपनियां 2 जी, 3 जी और 4 जी सेवा दे रही हैं। कॉल जेनरेट करने की हर एक की लागत अलग है। ऐसे में ऐसे फ्लोर प्राइस तय किए जा सकते हैं, जो सभी पक्षों को मंजूर हो और किसी को नुकसान न पहुँचे। अधिकारी ने इस बात से असहमति जताई कि मिनिमम टैरिफ तय करने से कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधरेगी। उन्होंने कहा कि सबसे सक्षम ऑपरेटर ही आर्थिक रूप से आगे निकलेगा।
ट्राई अगर किसी अक्षम कंपनी के नेटवर्क से काम शुरू होने की लागत को ध्यान में रखते हुए 15 पैसे प्रति मिनट का फ्लोर प्राइस तय करे तो वह ऑपरेटर कुछ ही तिमाहियों तक सरवाइव कर सकता है। लेकिन, आर्थिक रूप से सक्षम वह कंपनी बहुत फायदा उठाएगी, जिसकी कॉल जेनरेट करने की लागत हो सकता है कि 5 पैसे प्रति मिनट हो।
साथ ही अधिकारी ने कहा, कि यह सक्षम ऑपरेटर इस बढ़त का लाभ लेकर दूसरी कंपनियों का वजूद मिटा सकता है। अधिकारी ने बताया, केवल श्रीलंका ने इस तरह का फ्लोर प्राइस तय किया है। सरकार उस मॉडल का अध्ययन कर रही है। साथ ही दूसरे देशों के प्राइसिंग मॉडलों पर भी गौर किया जा रहा है।


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