भारत में बिजली की मांग में लगभग 7% की वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब आर्थिक विस्तार 6 साल में सबसे कमजोर हो गया है, यह पहली नज़र में विरोधाभास के रूप में दिखाई दे सकता है जबकि यही सच है।
अप्रैल-जुलाई की अवधि में देश के सबसे बड़े औद्योगिक राज्यों में बिजली की आवश्यकता में कमी आई, क्योंकि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में व्यापक मंदी के साथ कारोबार की मांग बढ़ी है। दूसरी ओर जिन राज्यों में डिमांड ज्यादा है उसका कारण यह है कि वहां का एक बड़ा क्षेत्र बिजली से जोड़ा जा रहा है।

ऑटोमोबाइल और अन्य एसेसरीज बनाने वाले राज्य तमिलनाडु और महाराष्ट्र में क्रमशः मांग में 2.7% और 1.4% की वृद्धि हुई है सरकार के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों से पता चलता है कि बड़े बिजली उपभोक्ताओं के बीच विकास में सबसे धीमी वृद्धि हो रही है।
हरियाणा और गुजरात मैन्युफैक्चरिंग का हब हैं, जिसमें बिजली की आवश्यकता पिछले वर्ष के 7.5% और 8.8% की तुलना में कमजोर 2.9% और 5.3% की दर से बढ़ रही थी।
तो वहीं कई ऑटो सेक्टर मंदी और कम बिक्री की वजह से अपने कारखाने तक बंद कर रहे हैं। कारखानों और वाणिज्यिक कंपनियों की बढ़ती मांग से भी बिजली की खपत ज्यादा हो रही है। अंतत: अर्थ यह निकल रहा है कि विकास के नाम पर जो कारखाने और फैक्टिरियां बन रही हैं उनसे उतना लाभ तो नहीं मिल रहा है परन्तु बिजली की मांग जरुर बढ़ रही है।
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश बिजली उत्पादन आयोग ने खर्च में बढोतरी और राजस्व में कमी की स्थिति को देखते हुए मंगलवार को राज्य में बिजली की दरों में 12 फीसदी तक बढोतरी को मंजूरी दी है। सरकारी विज्ञप्ति में बताया गया कि आयोग ने सरचार्ज (राज्य की वितरण कंपनियों के लिए 4.28 प्रतिशत) समाप्त कर दिया है। इस गणना से घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों के उपभोक्ताओं के लिए दरों में वृद्धि होगी।


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