एक ओर जहां देश की अर्थव्यवस्था सुधर रही है तो वहीं दूसरी ओर देश का विदेशी मुद्रा भण्डार घटकर 429.6 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। 26 जुलाई को समाप्त सप्ताह में यह 72.7 करोड़ डॉलर घटकर 429.65 अरब डॉलर रह गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नवीनतम आंकड़ों से इसका पता चलता है। आपको बता दें कि विदेशी मुद्रा भंडार घटने के पीछे विदेशी मुद्रा विनिमय अधिकारियों (FCA) की कमी मुख्य कारण है।

इस बारे में केंद्रीय बैंक ने बताया कि सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 1.734 अरब डॉलर घटकर 399.357 अरब डॉलर रह गई है। विदेशी मुद्रा भंडार में एफसीए का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। इसे डॉलर में व्यक्त किया जाता है। विदेशी मुद्रा भंडार में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं के घटने-बढ़ने का इस पर असर पड़ता है।
आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान देश का स्वर्ण भंडार 1.025 अरब डॉलर बढ़कर 25.330 अरब डॉलर हो गया है। आंतरिक मुद्रा कोष (IMF) में देश के विशेष ड्रॉइंग राइट्स 28 लाख डॉलर घटकर 1.444 अरब डॉलर रह गए।
केंद्रीय बैंक ने बताया कि आईएमएफ में देश के रिजर्व पोजिशन भी 1.58 करोड़ डॉलर घटकर 3.534 अरब डॉलर पर पहुंच गए। यह भी देश के विदेशी मुद्रा भंडार का ही हिस्सा होता है।
आपको बता दें कि हाल ही में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने जीडीपी के ग्रोथ के अनुमानों को घटाया है। इसमें 0.20 प्रतिशत की कटौती की है। 2019-20 के लिए क्रिसिल ने अपने अनुमान घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिए हैं। इसके पीछे उसने कमजोर मानसून और सुस्त होती अर्थव्यवस्था का हवाला दिया है। जीडीपी ग्रोथ का अनुमान पिछले वित्त वर्ष की 6.8 प्रतिशत की वृद्धि से थोड़ा ज्यादा है। लेकिन, 7 प्रतिशत के 14 साल के औसत से कम है।
नवंबर 2016 में नोटबंदी ने खपत पर बुरा असर डाला। इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां गईं और इनकम घटी। अगला झटका जुलाई 2017 में जीएसटी के लागू होने से लगा। रिफंड मिलने में देरी से निर्यात को नुकसान पहुंच। नोटबंदी और जीएसटी के झटकों से अर्थव्यवस्था उबर ही रही थी कि आईएल एंड एफएस के डिफॉल्ट के बाद 2018 में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का वित्तीय संकट खड़ा हो गया। 2018 के अंत तक ग्लोबल ट्रेड में नरमी, अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर ने अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई।


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